Beyond the Pencil Line: Unsolved Border Crises and Smart Solutions

1947 साल का 8 जुलाई, लंदन के जाने-माने वकील सर सिरिल रेडक्लिफ नई दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतरे। इससे पहले वे कभी भी स्वेज नहर के पूर्व में नहीं आए थे। भारत की भौगोलिक विविधता और यहाँ की आबादी के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। फिर भी उनके हाथों में एक पूरे देश को काटकर तीन हिस्सों में बनाने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी सौंप दी गई।

नई दिल्ली के वायसराय हाउस जो आज का राष्ट्रपति भवन है, उस के एक बंद कमरे में रेडक्लिफ ने काम शुरू किया। उनके पास सिर्फ 36 दिन थे। सामने 1941 की अधूरी जनगणना, अस्पष्ट पुराने नक्शे और एक लाल-नीली पेंसिल रखी थी। बिना किसी ज़मीनी जांच के, सिर्फ बंद कमरे में नक्शे के सहारे लगभग 8 करोड़ लोगों की पहचान तय कर दी गई। बंद कमरे में लिए गए इस फैसले के पीछे एक बड़ी राजनीतिक जल्दबाजी थी ।

पर्दे के पीछे की राजनीति और माउंटबेटन का प्रेशर

योजना के अनुसार देश को जून 1948 में आजाद होना था। लेकिन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने इस तारीख को 10 महीने पहले खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया। सिर्फ 5 हफ्तों में हजारों किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा खींचने का यह भारी दबाव रेडक्लिफ पर आ गया।

बही दूसरी तरफ मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग और नेहरू व पटेल की कांग्रेस के बीच चल रही खींचतान के बीच रेडक्लिफ को सिर्फ नाममात्र का प्रमुख बनाया गया था। लेकिन दस्तावेजों से पता चलता है कि पंजाब के फिरोजपुर, जीरा और गुरदासपुर जैसे संवेदनशील इलाकों की सीमा तय करने में लॉर्ड माउंटबेटन ने गुप्त रूप से दबाव डाला था, ताकि कुछ खास भौगोलिक फायदे हासिल किए जा सकें। माउंटबेटन के इस गुप्त दबाव और जल्दबाजी का असर सीधे तौर पर ज़मीनी हकीकत पर पड़ा ।

टेबलक्लॉथ कार्टोग्राफी: ज़मीनी हकीकत से दूर जल्दबाजी का विभाजन

ग्राउंड रियलिटी को पूरी तरह नजरअंदाज करके सिर्फ डेस्कटॉप पर स्केल रखकर नक्शा काटने की इस शैली को इतिहासकार टेबलक्लॉथ कार्टोग्राफी कहते हैं। सीमा आयोग ने 1941 की जिस जनगणना का इस्तेमाल किया था, वह दूसरे विश्व युद्ध के कारण पहले से ही खराब थी। नतीजा यह हुआ कि पेंसिल की एक लाइन से नदियों का प्राकृतिक बहाव दो हिस्सों में बंट गया। नदी का एक किनारा भारत में आया तो दूसरा पाकिस्तान में। कहीं रेल की पटरी एक देश में थी, तो उसका स्टेशन दूसरे देश में चला गया।

मेहरपुर, दिनाजपुर या पंजाब के सीमावर्ती गांवों में अजीब हालात बन गए। किसी घर की रसोई भारत में पड़ी, तो सोने का कमरा पाकिस्तान में। नदियों और खेती के सदियों पुराने प्राकृतिक रिश्तों को नजरअंदाज करके सिर्फ कागजी आंकड़ों के आधार पर खींचे गए नक्शे ने रातों-रात लाखों लोगों के जीवन को गहरे संकट में डाल दिया। लोगों की इस तबाही को देखकर रेडक्लिफ को खुद अपनी गलती का अहसास होने लगा था, जिसका सबूत उनकी डायरी में मिलता है ।

रेडक्लिफ की गुप्त डायरी: पछतावा, गुस्सा और दस्तावेज जलाने का सच

इस मानवीय तबाही को देखकर खुद सर सिरिल रेडक्लिफ को समझ आ गया था कि वे एक बड़ी ऐतिहासिक भूल का हिस्सा बन रहे हैं। उनके इस पछतावे का सबूत उनके पर्सनल लेटर्स में मिलता है। 14 अगस्त 1947 की रात भारत छोड़ने से पहले अपनी पत्नी एंटोनिया को लिखे एक गुप्त पत्र में उन्होंने बहुत दुखी होकर लिखा था:

"आज के बाद लगभग 8 करोड़ गुस्से में भरे लोग मुझे ढूंढेंगे। भारत या पाकिस्तान को चाहने वाला कोई भी इंसान मुझसे कभी प्यार नहीं कर पाएगा। काटने और मारने की प्रवृत्ति वाले ये 8 करोड़ लोग आज से मुझसे नफरत करेंगे।"

अंग्रेजों की चालाकी भी उनसे छिपी नहीं थी। माउंटबेटन और ब्रिटिश प्रशासन ने आजादी के दिन नक्शा जारी नहीं किया, बल्कि उसे  दो दिन बाद यानि 17 अगस्त तक रोके रखा, ताकि दंगों और हिंसा की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर न आकर भारत और पाकिस्तान पर पड़े। इससे रेडक्लिफ अंग्रेजों से बहुत नाराज हुए। भारत छोड़ने की एक रात पहले उन्होंने सीमा आयोग से जुड़े सभी ड्राफ्ट, नोट्स और पर्सनल डॉक्यूमेंट्स आग में जला दिए, जिसे इतिहास में ऑपरेशन बर्न-आउट कहा जाता है।

काम खत्म होने के बाद तय 2,000 पाउंड यानि उस समय के लगभग 40,000 रुपये की फीस लेने से उन्होंने साफ मना कर दिया और उसे खून का पैसा कह कर लौटा दिया। रेडक्लिफ के ये पर्सनल लेटर्स और कानूनी दस्तावेज आज भी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की बोडलियन लाइब्रेरी और लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। इतिहास के उन कागजों में दर्ज इन गलतियों के निशान आज भी प्रासंगिक हैं ।

5. आज का सीमा संकट: क्या यह सिर्फ पेंसिल की लकीर है या गहरा घाव?

इतिहास के उन दस्तावेजों से आगे बढ़कर आज इतने सालों बाद सवाल उठता है, क्या आज का भारत-पाकिस्तान कश्मीर विवाद, सर क्रीक का पानी का विवाद या भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के एनक्लेव यानी छिटमहल की समस्या सिर्फ रेडक्लिफ की उस पेंसिल की लकीर का नतीजा है? गहराई से देखें तो रेडक्लिफ का नक्शा एक बड़ी बीमारी का सिर्फ बाहरी रूप था। इसकी असली जड़ अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो वाली नीति में थी।

साथ ही, उस समय के कुछ नेताओं के जल्दबाजी भी इसके लिए जिम्मेदार थी। वे यह समझ नहीं पाए कि नदियों, पहाड़ों या संस्कृति को सिर्फ धर्म के आंकड़ों में नहीं बांटा जा सकता। हालांकि, 2015 के ऐतिहासिक भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते ने यह साबित कर दिया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो पुराने जख्मों को भी भरा जा सकता है।

एक्सपर्ट्स के सुझाए गए वे विकल्प, जिन्हें सरकार ने अभी नहीं अपनाया है

भारत-बांग्लादेश समझौते की तरह ही बाकी बची सीमाओं की जटिलताओं को सुलझाने के लिए देश के सुरक्षा और राजनीति के जानकारों ने लंबे समय से कुछ व्यावहारिक रास्ते सुझाए हैं, जो अभी तक सरकारी नीति का हिस्सा नहीं बन पाए हैं।

कश्मीर विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए लाइन ऑफ कंट्रोल यानि LOC को थोड़े-बहुत बदलाव के साथ कानूनी अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने का प्रस्ताव नई दिल्ली के इंस्टीट्यूट आफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के पूर्व प्रमुख के. सुब्रह्मण्यम और 2004-2007 के बैकचैनल कूटनीति के मुख्य कूटनीतिक नीति-निर्माताओं ने दिया था। 1994 के संसदीय प्रस्ताव की वजह से सरकार ने इसे खुले तौर पर अपनाया नहीं, लेकिन लंबे समय के संघर्ष से बचने के लिए इसे सबसे सही रास्ता माना जाता है।

सियाचिन ग्लेशियर से दोनों देशों की सेनाओं को हटाकर इस इलाके को एक अंतरराष्ट्रीय हिमालयन एनवायरनमेंटल पीस पार्क यानि एक पर्यावरण शांति पार्क बनाने का आइडिया पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल वी. आर. राघवन और सीपीआर यानि सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च के शोधकर्ता श्याम सरन ने दिया था। अगर इस योजना को लागू किया जाए, तो अत्यधिक ठंड और खराब मौसम में सैनिकों की होने वाली बेमतलब मौतों को हमेशा के लिए रोका जा सकता है।

सर क्रीक के पानी के विवाद को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम थलवेग सिद्धांत यानि नदी के सबसे गहरे हिस्से को सीमा मानने की नियम लागू करने का सुझाव दिल्ली के मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के विशेषज्ञ डॉ. उत्तम कुमार सिन्हा ने दिया था। इसके जरिए सीमा तय करके आसपास के समुद्री इलाके को तेल-गैस की खोज और मछली पकड़ने के लिए ज्वाइंट डेवलपमेंट जोन बनाया जा सकता है, जो पूरी तरह से लॉजिकल है।

भारत-चीन सीमा यानि LAC पर बार-बार होने वाले झगड़ों को रोकने के लिए तीनों सेक्टरों के सही नक्शों का आदान-प्रदान करने और विवादित इलाकों में बफर जोन बनाने की बात थिंक टैंक कारनेगी इंडिया के शिवशंकर मेनन ने कही है। 1993 और 1996 के समझौतों के आधार पर यह सुझाव दिया गया था, लेकिन चीन की बेरुखी के कारण यह अभी तक अटका हुआ है।

आखिर में, बीएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी जैसे अलग-अलग सुरक्षा बलों को अलग रखने के बजाय एक कमान के तहत लाकर इंटीग्रेटेड बর্ডার मैनेजमेंट अथॉरिटी बनाने की सिफारिश 1999 की कारगिल रिव्यू कमेटी और 2000 की माधव गोडबोले टास्क फोर्स ने की थी। आपसी तालमेल की कमी और खुफिया जानकारी के गैप को भरने के लिए यह कदम उठाना बेहद जरूरी है।

आज की ज़मीनी हकीकत: सरकार के कदम, काम की स्थिति और चुनौतियां

विशेषज्ञों के इन सुझावों के अलावा, वर्तमान में भारत सरकार ने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ प्रैक्टिकल कदम भी उठाए हैं, जो अलग-अलग स्तर पर लागू हैं।

टेक्नोलॉजी के मामले में सरकार ने इसरो इसरो के सैटेलाइट, थर्मल ड्रोन और लेजर दीवारों को मिलाकर स्मार्ट फेंसिंग सिस्टम शुरू किया है। इससे घुसपैठ काफी कम हुई है, लेकिन पहाड़ी और नदी वाले इलाकों में खराब मौसम के कारण कभी-कभी तकनीकी दिक्कतें आ जाती हैं।

बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए बांग्लादेश, नेपाल और भूटान सीमा पर इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट और बॉर्डर पर बाजार बनाए गए हैं, जिससे व्यापार आसान हुआ है। हालांकि, पाकिस्तान बॉर्डर पर आतंकवाद और चीन बॉर्डर पर तनाव के कारण वहां ऐसे आर्थिक रास्ते नहीं बनाए जा सके हैं।

खास कूटनीतिक कदमों के तहत 2019 में करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोला गया, जिससे कड़ी सुरक्षा के बीच लोगों को धार्मिक यात्रा का मौका मिला। लेकिन सुरक्षा के खतरों को देखते हुए हर जगह लचीली सीमा या खुली आवाजाही की अनुमति देना संभव नहीं है।

कुल मिलाकर, 2015 का भारत-बांग्लादेश बॉर्डर समझौता यह दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो बड़े से बड़ा मसला हल हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान और चीन के साथ भरोसे की कमी के कारण वहां के बड़े समाधान अभी तक ठंडे बस्ते में हैं।

कल के देश-निर्माताओं से अपील: सुरक्षा और तरक्की के नए रास्ते की तलाश

इन पेचीदा समस्याओं के बीच देश के भविष्य को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी अब आने वाली पीढ़ी पर है । इस गतिरोध को तोड़ने के लिए आज देश के युवाओं और भविष्य के लीडर्स को आगे आना होगा। जिस रेडक्लिफ की लाइन ने कभी हमारे देश को काटा था, उसका दर्द आज भी हम झेल रहे हैं। लेकिन यह बीता हुआ कल हमारी सुरक्षा और तरक्की की राह में रुकावट नहीं बनना चाहिए।

आज देश के युवाओं, विचारकों, कूटनीतिज्ञों और नेताओं के सामने एक नई सोच अपनाने का समय क्या नहीं आया है ? पुरानी सीमाओं के विवादों को सिर्फ सैन्य नजरिए से हल नहीं किया जा सकता। इसलिए विशेषज्ञों के सुझावों पर राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए फिर से विचार करना चाहिए। अगर सीधे रास्ते से बात न बने, तो टेक्नोलॉजी और कूटनीति के दूसरे रास्तों का इस्तेमाल करना होगा।

एक सुरक्षित और आत्मविश्वासी भारत बनाने के लिए बॉर्डर को सिर्फ झगड़े की जगह न मानकर एक मजबूत सुरक्षा घेरा बनाना होगा। आज के और कल के नीति-निर्माताओं से यही अपील है कि पुरानी गलतियों की सजा पीढ़ियों तक भुगतने के बजाय, समझदारी, हिम्मत और दूरदर्शी चिंता से ऐसा कदम उठाएं जो भारत को स्थायी सुरक्षा और दुनिया में एक मजबूत पहचान दिलाए।