A Song That Shook the British Empire: 'Vande Mataram', the Bloody History of a Banned Tune, and Today's Controversy

आज से लगभग 120 साल पहले, 1905 की एक सुबह कोलकाता की सड़कों पर हजारों लोग नंगे पैर उतर आए थे। उनके हाथों में कोई हथियार नहीं था, लेकिन जुबां पर बस दो शब्द थे–'वंदे मातरम'। अजीब बात यह थी कि लोग बिल्कुल निहत्थे थे। इसके बावजूद इन दो शब्दों को सुनकर उस वक्त की सबसे ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिल गई थी।

एक साधारण सी कविता आखिर कार सरकार के लिए इतना बड़ा डर कैसे बन गई? क्यों सड़कों पर सिर्फ ये दो शब्द बोलने के अपराध में छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर कोड़े बरसाए गए? अंग्रेजों के उस खौफनाक क्रैकडाउन से लेकर आज के दौर के विवाद तक–यह है वंदे मातरम का पूरा और असली इतिहास।

गाने की पैदाइश: 'आनंदमठ' से लेकर जनसभाओं तक

यह कहानी शुरू होती है 1870 के दशक में। हुगली के चुंचुड़ा में गंगा नदी के किनारे बैठकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के डिप्टी मजिस्ट्रेट बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने एक कविता लिखी, जिसका नाम था वंदे मातरम। इस दो शब्दों का सीधा सा मतलब था, हे माँ, मैं तेरी वंदना करता हूँ। यहाँ 'माँ' कोई खास देवी-देवता नहीं थीं, बल्कि खुद भारत भूमि ही कवि के लिए माँ का रूप थी। 1882 में बंकिम चंद्र के मशहूर नॉवेल आनंदमठ में यह कविता पहली बार पब्लिश हुई।

लेकिन तब यह कविता सिर्फ किताबों के पन्नों तक सिमटकर नहीं रही। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता सेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सुरों में पिरोकर पहली बार पब्लिक के सामने गाया। पर उस समय ब्रिटिश गवर्नमेंट इसका अंदाजा भी नहीं लगा पाई थी। उन्हें बिल्कुल अहसास नहीं था कि यह शांत धुन एक दिन उनके साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी।

बंगाल विभाजन और आग की तरह फैलती धुन

1905 में जब वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन का फैसला सुनाया, तो पूरे बंगाल में विरोध की आग भड़क उठी। 16 अक्टूबर को विभाजन के दिन रवींद्रनाथ टैगोर के कहने पर लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधी। इस ऐतिहासिक आंदोलन का सबसे बड़ा नारा बन गया वंदे मातरम। किसी भी पॉलिटिकल स्पीच से ज्यादा, यह गाना कुछ ही पलों में हजारों लोगों को एकजुट कर देता था। इसे देखकर ब्रिटिश सरकार बुरी तरह घबरा गई।

अंग्रेजों का बर्बर क्रैकडाउन

इस गाने के असर को खत्म करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक के बाद कड़े कानून बनाए और पुलिसिया अत्याचार शुरू कर दिया। सरकार ने सर्कुलर जारी करके स्टूडेंट्स के लिए इस गाने पर पूरी तरह बैन लगा दिया।

वंदे मातरम के नारे को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय पर भारी अत्याचार किए। 1906 के बारीसाल सम्मेलन में शांतिपूर्ण जुलूस पर क्रूर लाठीचार्ज किया गया। गाँवों में गोरखा सेना तैनात कर दी गई। यहाँ तक कि 14 साल के एक नौजवान सुशील सेन को 15 कोड़े मारने की सजा दी गई, लोगों पर गोली चलवाई गई। इस खौफनाक क्रैकडाउन की पूरी रिपोर्ट उस दौर के प्रमुख न्यूज़पेपर्स जैसे संजीवनी, अमृत बाज़ार पत्रिका, वंदे मातरम और संध्या में छपी थी।

लेकिन कोड़ों और बंदूकों के इस खौफ से भी लोगों का हौसला नहीं टूटा। इस गुस्से ने नौजवानों को अहिंसा के रास्ते से हटाकर अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे सीक्रेट क्रांतिकारी संगठनों से जोड़ दिया। इसी का सीधा नतीजा था मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी का बम अटैक। आखिरकार यही वंदे मातरम ब्रिटिश हुकूमत के ताबूत की एक कील साबित हुआ।

ब्रिटिश लाइब्रेरी और सीक्रेट फाइलों का बड़ा खुलासा

बाद में सामने आईं ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट्स और ब्रिटिश लाइब्रेरी के होम पॉलिटिकल सीक्रेट रिकॉर्ड्स को देखने पर पता चलता है कि, इस गाने का डर अंग्रेजों के दिल में कितना गहरा बैठा था।

1907 से 1917 की ब्रिटिश सी.आई.डी सीक्रेट फाइलों के मुताबिक, वंदे मातरम अंग्रेजों के लिए सिर्फ एक नारा नहीं था। उनकी नजर में यह एक खतरनाक साइकोलॉजिकल वेपन था। 1857 के सिपाही विद्रोह के डर से मिलिट्री कैंप्स में यह गाना गाने और इसकी कॉपी रखने पर पाबंदी लगा दी गई थी।

लंदन की स्कॉटलैंड यार्ड ने 1909 के आसपास भारतीय स्टूडेंट्स की चिट्ठियाँ चुपके से पढ़ना शुरू कर दिया। चिट्ठी में सिर्फ वंदे मातरम लिखा मिलने पर ही छात्र को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता था। क्रांतिकारियों के लिए यह गाना एक सीक्रेट पासवर्ड बन चुका था। जिस भी किताब में यह कविता छपती, उसे जब्त कर लाल स्याही से  प्रोसक्राइब्ड यानि जप्त का ठप्पा लगाया जाता था। फिर उन्हें सीधे लंदन के आर्काइव भेज दिया जाता था। अंग्रेज समझ चुके थे कि तोपों से सड़कें तो खाली कराई जा सकती हैं, लेकिन दिलों में बसी धुन को दबाने का कोई कानूनी या मिलिट्री हथियार उनके पास नहीं है।

चलती आ रही वंदे मातरम विवाद: एक निष्पक्ष और आधुनिक नागरिक का नज़रिया

आज़ादी के इस महामंत्र को लेकर बाद के दिनों में कई धार्मिक और कानूनी विवाद खड़े हुए। खासकर इसके देवी-रूप और शाब्दिक अर्थ को लेकर काफी बहस हुई।

वंदे मातरम को लेकर विवाद की मुख्य वजह इसकी साहित्यिक खूबसूरती को सिर्फ एक धार्मिक चश्मे से देखना है। एक तबके का मानना है कि बाद की पंक्तियों में दी गई देवी की उपमा उनके धार्मिक विश्वास से मेल नहीं खाती। इसी वजह से ऐतिहासिक तौर पर केवल शुरुआती दो स्टैंजा पर ही जोर दिया गया था।

लेकिन एक समझदार और निष्पक्ष नागरिक के नजरिए से देखें तो यह पूरी कविता सच्ची देशभक्ति की भावना है। कवि बंकिम चंद्र ने यहाँ कोई धार्मिक पूजा का तरीका नहीं बताया। उन्होंने अपनी मातृभूमि की महानता दिखाने के लिए एक साहित्यिक रूपक यानि मेटाफोर का इस्तेमाल किया था। अगर आपका मकसद सिर्फ देश की शान बढ़ाना है, तो बाद की पंक्तियाँ भी किसी विवाद की वजह नहीं बन सकतीं। अपने धार्मिक विश्वास पर कायम रहते हुए भी साहित्य के इस हुनर को समझना और मातृभूमि के सम्मान को सबसे ऊपर रखना ही, एक जागरूक नागरिक की असली पहचान है।

24 जनवरी 1950 को आजाद भारत की संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को बराबरी के दर्जे के साथ राष्ट्रीय गीत घोषित किया।

आज न तो कोड़ों का डर है और न ही ब्रिटिश हुकूमत का कोई काला कानून। लेकिन इतिहास हमें याद दिलाता है कि जब कोई कविता या धुन किसी गुलाम देश की आत्मा की आवाज बन जाती है, तो दुनिया की कोई भी ताकत उसकी गूंज को दबा नहीं सकती। वंदे मातरम सिर्फ दो शब्द नहीं हैं–यह भारत की आजादी के पन्नों पर खून से लिखा हुआ एक अमर इतिहास है।