Gupta Empire: The 'Golden Age' of ancient India that showed the way to the world

चौथी शताब्दी से छठी शताब्दी तक–यानी लगभग ढाई सौ वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रसिद्ध गुप्त राजवंश ने शासन किया था। इतिहासकारों के अनुसार, यह काल केवल सैन्य शक्ति के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि कला, विज्ञान, साहित्य और बेहतरीन शासन व्यवस्था के विकास के कारण इसे प्राचीन भारत का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है। चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त और विक्रमादित्य जैसे दूरदर्शी शासकों के शासनकाल में भारत ने ऐसे कई ऐतिहासिक योगदान दिए, जो आज इक्कीसवीं सदी की आधुनिक दुनिया में भी उतने ही रेलेवेंट हैं। महत्वपूर्ण खोजों और आधुनिक जीवन के साथ उनके जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए आइए जानते हैं प्राचीन भारत के इस सुनहरे अध्याय की कहानी।

१. स्वतंत्र नागरिक जीवन, ‘पुण्यशाला’ और मानवतावादी शासन व्यवस्था

पाँचवीं शताब्दी की शुरुआत में चीनी पर्यटक फा-हीयन (Fa-Hien) भारत आए और तत्कालीन समाज व्यवस्था को देखकर चौंक गए थे। उनके प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत 'फो-कूओ-की' में उल्लेख है कि गुप्त साम्राज्य का प्रशासन बहुत ही उदार और अपराध-मुक्त था। उस समय एक राज्य से दूसरे राज्य जाने के लिए आम लोगों या व्यापारियों को किसी तरह के सरकारी परमिट या सख्ती का सामना नहीं करना पड़ता था। लोग पूरी तरह स्वतंत्र और सुरक्षित रूप से अपने कारोबार और यात्रा करते थे।

उस समय की ग्लोबल दुनिया के हिसाब से यह बहुत बड़ी बात थी। उस दौर में चीन, रोम या फारस जैसे देशों में आने-जाने पर कड़ी निगरानी और रजिस्ट्रेशन के सख्त नियम थे। फा-हीयन अपने देश की ऐसी सख्त पाबंदियों के आदी थे, इसीलिए उन्होंने गुप्त काल के इस खुले माहौल को अपनी किताब में खास तौर पर जगह दी। आज हम जिस 'फ्री ट्रेड' या बिना किसी प्रशासनिक झंझट के स्वतंत्र जीवन की बात करते हैं, प्राचीन इतिहास में यह उसी की एक शुरुआती झलक थी।

आम लोगों की हेल्थकेयर के लिए पूरे राज्य में ‘पुण्यशाला’ नाम से चिकित्सा केंद्र बनाए गए थे। यहाँ सरकार के खर्च पर मुफ्त रहना, जड़ी-बूटियाँ और दवाइयाँ मिलती थीं। यह आज की मुफ्त स्वास्थ्य सेवा या वेलफेयर स्टेट का सबसे पुराना उदाहरण है। अपराध दर बहुत कम होने के कारण कड़ी सजा की जगह मुख्य रूप से हल्के जुर्माने का नियम था।

इस उदार समाज व्यवस्था के अलावा तत्कालीन नागरिकों का जीवन और संस्कृति भी बहुत जीवंत थी। नाटक और साहित्य में समाज की विविधता साफ दिखाई देती है। राजपरिवार और विद्वान ‘संस्कृत’ भाषा बोलते थे, जबकि आम लोग और महिलाएँ बोलचाल की ‘प्राकृत’ भाषा का इस्तेमाल करते थे। जीवन की यह भव्यता उनके दैनिक खान-पान में भी झलकती थी। आज हम भारतीय खाने में जड़ी-बूटियों और मसालों का जो इस्तेमाल देखते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा गुप्त काल की शाही रसोई में ही शुरू हुआ था।

२. आर्यभट्ट और वराहमिहिर: गणित, स्पेस साइंस और प्राचीन तकनीक की विजय यात्रा

गुप्त काल की सबसे बड़ी उपलब्धि साइंस और गणित का विकास थी। मात्र 23 वर्ष की आयु में, 499 ईस्वी में प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटयीय’ लिखा। उन्होंने ‘शून्य’ (0) और डेसिमल सिस्टम का गणितीय आधार मजबूत किया। इसके अलावा उन्होंने ऐसे कई सिद्धांत खोजे, जो यूरोपीय सोच से कई सदियों आगे थे।

गणित के क्षेत्र में प्राचीन भारत का योगदान केवल शून्य तक सीमित नहीं था। प्राचीन भारतीय विद्वान पिंगल (Pingala) ने अपनी पुस्तक ‘छंदशास्त्र’ में बहुत पहले बाइनरी सिस्टम के शुरुआती नियमों की खोज कर ली थी, जो आज के कंप्यूटर साइंस की बुनियादी नींव है। इसके साथ ही, खेल जगत में भी इस काल का बड़ा योगदान रहा। आज पूरी दुनिया में लोकप्रिय खेल ‘चेस’ (Chess) का शुरुआती रूप ‘चतुरंग’ इसी गुप्त काल में भारत में शुरू हुआ था।

गणित के साथ-साथ स्पेस टेक्नोलॉजी में भी बड़े बदलाव आए। यूरोप में कॉपरनिकस से करीब एक हजार साल पहले आर्यभट्ट ने गणित से यह साबित कर दिया था कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि अपनी ऑर्बिट पर लगातार घूमती है । उन्होंने ‘पाई’ (π) का सटीक मान (3.1416) निकाला और विश्लेषण करके एक साल की सही लंबाई लगभग 365.2585 दिन बताई। यहीं नहीं, चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के असली वैज्ञानिक कारण भी सबसे पहले उन्होंने ही बताए थे।

ठीक इसी समय छठी शताब्दी में (505-587 ईस्वी) प्रसिद्ध प्राचीन खगोलविद वराहमिहिर ने अपनी पुस्तक ‘बृहत्संहिता’ में मिट्टी के प्रकार, पौधों की विविधता और कॉस्मिक ऑब्जेक्ट्स के प्रभाव को परखकर जमीन के नीचे मीठे पानी का स्तर (Hydrogeology) पता लगाने के तरीके लिखे थे। भारत का 'Central Ground Water Board' (CGWB) और ISRO आज भी स्पेस से मिलने वाले सैटेलाइट डेटा के साथ-साथ वराहमिहिर द्वारा बताए गए इन प्राकृतिक संकेतों के नियमों को मिलाकर जमीन के नीचे पानी खोजने का काम करते हैं।

३. जंग-रोधी लोहा, रसायन विज्ञान और प्राचीन प्लास्टिक सर्जरी

दिल्ली के महरौली में बना प्रसिद्ध ‘लौह स्तंभ’ गुप्त काल की मेटलर्जी और इंजीनियरिंग का एक अद्भुत उदाहरण है। यह लगभग 402 ईस्वी में बना था। सोलह सौ से अधिक वर्षों से तेज धूप और बारिश झेलने के बावजूद इस विशाल लोहे के खंभे पर आज तक जरा भी जंग नहीं लगा है। गुप्त काल के रसायन शास्त्रियों ने लोहा बनाते समय एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया था। इससे लोहे में हवा की ऑक्सीजन नहीं लग पाती और कभी जंग नहीं लगता।

लोहे के अलावा अन्य धातु कलाओं में भी वे माहिर थे। 500 ईस्वी के आसपास शुद्ध कांस्य से बनी साढ़े सात फीट ऊँची ‘सुल्तानगंज बुद्ध’ की मूर्ति भी इसी दौर की है। इसे ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ (Lost-wax casting) तकनीक से बनाया गया था। धातु की तकनीक के साथ-साथ रोजमर्रा का रसायन विज्ञान भी काफी उन्नत था। सुंदर दिखने के सामान, कस्तूरी-चंदन और हर्बल परफ्यूम बनाने के लिए उस समय ‘गंधशास्त्र’ नाम के एक खास विषय की चर्चा होती थी।

विज्ञान के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी यह युग अद्भुत था। महर्षि सुश्रुत की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उस समय के डॉक्टर बहुत बारीक और मुड़ी हुई सुइयों से आँखों के मोतियाबिंद (Cataract) का ऑपरेशन करते थे। युद्ध के मैदान में कटे या क्षतिग्रस्त नाक को ठीक करने के लिए प्राचीन प्लास्टिक सर्जरी (Rhinoplasty) सफलतापूर्वक की जाती थी। गुप्त काल की यह सर्जरी तकनीक आज दुनिया भर में मॉडर्न प्लास्टिक सर्जरी और आँखों के इलाज की नींव बनी हुई है।

४. अजंता की गुफाएँ: रोशनी पहुँचाने की खास तकनीक और वैश्विक व्यापार

महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं की पेंटिंग्स का एक बड़ा हिस्सा पाँचवीं शताब्दी में (450-500 ईस्वी) गुप्त राजाओं और उनके सामंतों के संरक्षण में तैयार हुआ था। पहाड़ों के बिल्कुल भीतर और अंधेरी गुफाओं में इतनी बारीक तस्वीरें कैसे बनाई गईं? उस समय तो बिजली थी नहीं, और अगर मशाल जलाई जाती तो उसके धुएँ से दीवारों की खूबसूरत तस्वीरें खराब होने का डर था।

इस समस्या को हल करने के लिए इंजीनियरों ने रोशनी को मोड़ने या परावर्तित करने की एक खास तकनीक निकाली। वे गुफा के बाहर चमकीले धातु के आईने और सफेद कपड़ों को एक खास एंगल पर पकड़ते थे। इससे सूरज की रोशनी घूमकर गुफा के अंदर पहुँच जाती थी। रोशनी को नियंत्रित करने की यह रिफ्लेक्टर तकनीक आज मॉडर्न आर्किटेक्चर और सोलर पैनल में इस्तेमाल होती है। अजंता की पेंटिंग्स में उन्होंने ‘फ्रेस्को-सेको’ (Fresco-secco) पद्धति का इस्तेमाल किया था। वहाँ की तस्वीरों में इस्तेमाल होने वाला बेहद दुर्लभ और चमकीला नीला रंग ‘लैपिस लाजुली’ दूर अफगानिस्तान इलाके से मंगाया जाता था। अजंता के सैकड़ों साल पुराने पक्के प्राकृतिक रंगों पर वैज्ञानिक आज भी रिसर्च करके इको-फ्रेंडली डाइस (Eco-friendly Dyes) बनाने का काम कर रहे हैं।

५. नालंदा यूनिवर्सिटी और सुनहरी अर्थव्यवस्था

सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के संरक्षण में 427 ईस्वी में प्रसिद्ध ‘नालंदा यूनिवर्सिटी’ की स्थापना हुई। यह गुप्त वंश का एक बहुत बड़ा एडमिनिस्ट्रेटिव कॉन्ट्रीब्यूशन था। यह दुनिया के शुरुआती इंटरनेशनल रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटीज में से एक था। इसी यूनिवर्सिटी के मॉडल को देखकर आगे चलकर ऑक्सफोर्ड या हार्वर्ड जैसे कैंपसों की सोच विकसित हुई। चीन, फारस, तिब्बत और कोरिया से हजारों छात्र यहाँ पढ़ाई के लिए आते थे। लेकिन यहाँ एडमिशन पाना आसान नहीं था। मुख्य दरवाजे पर ‘द्वारपंडित’ की कठिन परीक्षा पास करनी होती थी, जिसमें सिर्फ बीस प्रतिशत छात्रों का चयन होता था।

गुप्त साम्राज्य की अर्थव्यवस्था भी बहुत शानदार थी। उनके शाही सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ और चाँदी के सिक्कों को ‘रूपक’ कहा जाता था। इन सिक्कों पर राजाओं की बहादुरी और कलाप्रेम की तस्वीरें उकेरी जाती थीं। उदाहरण के लिए, समुद्रगुप्त के सोने के सिक्के पर उन्हें खुद वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। यह उनके संगीत प्रेम का पक्का सबूत है।

६. निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो, गुप्त साम्राज्य सिर्फ राज्य जीतने का इतिहास नहीं था। यह प्राचीन भारत में विज्ञान की खोज, बेहतर शासन व्यवस्था और तकनीकी आविष्कारों का एक गौरवशाली दौर था। आज हम इक्कीसवीं सदी में जिन डिजिटल तकनीकों, स्पेस रिसर्च या चिकित्सा फायदों का आनंद ले रहे हैं, उनकी नींव सदियों पहले हमारे इसी प्राचीन भारत में रखी गई थी।