What happened to sick children in Ancient Sparta? Discover the shocking archaeological report.

2006 में रिलीज़ हुई पॉपुलर हॉलीवुड फिल्म 300 का वो सीन याद कीजिए। या हिस्टोरिकल कॉमिक बुक्स के उन ग्राफिक्स को देखिए। जहां टाइगेटस पहाड़ की एक अंधेरी और सुनसान चोटी। उसके नीचे हज़ारों कंकालों का ढेर लगा है। एक बेरहम स्पार्टन बुजुर्ग हाथ में एक नवजात बच्चे को लेकर चेक कर रहा है। अगर बच्चे के शरीर में ज़रा सी भी कोई कमी या कमजोरी दिखे, तो उसे तुरंत उस गहरी खाई में फेंक दिया जाता है।

सालों से इतिहास में इंटरेस्ट रखने वाले लोगों के दिमाग में ग्रीस को ले कर यह सीन बैठा हुआ है। कहा जाता है कि प्राचीन स्पार्टा में कमजोर, बीमार या विकलांग बच्चों को ज़िंदा नहीं रखा जाता था; उन्हें पहाड़ की चोटी से फेंककर मार दिया जाता था।

लेकिन क्या इतिहास की यह खौफनाक कहानी सच में होती थी? या फिर खुद को सभ्य दिखाने के लिए यूरोपीय इतिहासकारों और पुराने दुश्मनों ने स्पार्टन्स पर यह झूठा इल्ज़ाम मढ़ दिया था?

साइंस, मॉडर्न आर्कियोलॉजिकल सबूत और पुराने दस्तावेज़ अब एक नया सच सामने ला रहे हैं। असल में स्पार्टन्स बच्चों को पहाड़ से फेंककर नहीं मारते थे। लेकिन कमजोर बच्चों के साथ वे जो करते थे, वह भी काफी क्रूर था। वह एक तरह की मेंटल और सोशल क्रूरता थी, जिसकी मिसाल आज हज़ार साल बाद भी हमारे परिवारों और समाज में देखने को मिलती है।

मिथ की शुरुआत और आर्कियोलॉजिकल साइंस के सामने आता सच

स्पार्टन्स की इस क्रूरता का ज़िक्र सबसे पहले पहली शताब्दी ईस्वी में मिलता है। ग्रीक-रोमन इतिहासकार प्लूटार्क ने अपनी किताब Life of Lycurgus में लिखा था कि स्पार्टा में बीमार या कमजोर पैदा हुए बच्चों को अपोथेटाई नाम की जगह पर भेज दिया जाता था।

बाद के इतिहासकारों और ट्रांसलेटर्स ने अपोथेटाई शब्द का अलग मतलब निकाल लिया। उन्होंने मान लिया कि इसका अर्थ है–पहाड़ की चोटी से नीचे फेंक देना।

इसके बाद स्पार्टा के पुराने दुश्मन एथेंस के लेखकों ने इसे अपना पॉलिटिकल प्रोपेगैंडा बना लिया। उन्होंने इस कहानी को और बढ़ा-चढ़ाकर फैलाया ताकि स्पार्टन्स को असभ्य और निर्दयी दिखाया जा सके। आखिरकार 19वीं सदी के विक्टोरियन इतिहासकारों और 21वीं सदी के हॉलीवुड ने इस मिथ को कुछ हद तक सच मानकर पूरी दुनिया में फैला दिया।

साइंटिफिक और आर्कियोलॉजिकल सबूत

2007 से 2008 के बीच एथेंस यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च टीम ने इस पर काम किया। मशहूर आर्कियोलॉजिस्ट और एंथ्रोपोलॉजिस्ट डॉ. थियोडोरोस पिट्सियोस की लीडरशिप में टीम ने स्पार्टा की उस विवादित कायाडास खाई और टाइगेटस पहाड़ की गुफाओं में फोरेंसिक जांच की।

टीम ने खाई से 46 कंकालों के सैंपल जुटाए। उनकी रेडियोकार्बन डेटिंग की गई और हड्डियों के स्ट्रक्चर का एनालिसिस किया गया। जांच में पाया गया कि सभी कंकाल 18 से 35 साल के वयस्क पुरुषों के थे। इतिहासकारों के मुताबिक, ये लोग मेसिनियन युद्ध के कैदी, देशद्रोही या संगीन सजा पाए अपराधी थे जैसे स्पार्टा के आरोपी जनरल पासानियास थे। सबसे बड़ी बात यह है कि उस खाई में एक भी नवजात या बच्चे का कंकाल या हड्डी नहीं मिली।

साइंस ने साफ़ कर दिया है कि, पहाड़ की चोटी से मासूम बच्चों को फेंककर मारने की बात सिर्फ एक ऐतिहासिक कल्पना थी।

असल में स्पार्टन्स कमजोर बच्चों के साथ क्या करते थे?

पहाड़ से फेंकने की बात अगर सिर्फ एक अफवाह है, तो फिर असलियत क्या थी? क्या स्पार्टन्स अपने कमजोर बच्चों को प्यार से पालते थे? इतिहास के पन्ने पलटें तो जवाब मिलता है– नहीं। वे सीधे हथियार से या पटककर खून नहीं बहाते थे, लेकिन सामाजिक और मानसिक तरीकों से कमजोर बच्चों को बिल्कुल अलग-थलग कर देते थे या मरने के लिए छोड़ देते थे ।

स्पार्टा में बच्चा पैदा होने पर माता-पिता को उसे पालने का कोई पर्सनल कानूनी हक नहीं था। ग्रीक फिलॉसफर अरस्तू की किताब Politics और इतिहासकार प्लूटार्क की Life of Lycurgus के मुताबिक, नवजात को लेस्के यानी स्टेट टेस्टिंग काउंसिल के सामने ले जाया जाता था। वहाँ बुजुर्ग जज बच्चे की शारीरिक बनावट देखकर तय करते थे कि वह भविष्य का योद्धा बन सकता है या नहीं। काउंसिल से अप्रूवल मिलने पर ही माता-पिता बच्चे को पाल सकते थे।

मंज़ूरी मिलने के बाद उस बच्चे पर अंदरूनी कमजोरी चेक करने के लिए वाइन बाथ टेस्ट होता था। प्लूटार्क की Life of Lycurgus के अनुसार, स्पार्टा की माँए बच्चे को पानी के बजाय प्योर वाइन से नहलाती थीं। उनका मानना था कि कमजोर या मिर्गी वाले बच्चे वाइन का तेज़ असर नहीं सह पाएँगे और बेसुध होकर मर जाएँगे, जबकि सेहतमंद बच्चे और भी मजबूत हो जाएँगे। हालांकि मेडिकल साइंस के हिसाब से यह सिर्फ एक अंधविश्वास था।

इन टेस्ट्स में फेल होने वाले बच्चों को पहाड़ से नहीं फेंका जाता था, बल्कि सुनसान जगह पर छोड़ दिया जाता था। फिलॉसफर प्लेटो ने अपनी किताब Republic में इस रिवाज का ज़िक्र किया है, जिसे प्राचीन ग्रीस में एकथेसिस  यानी सुनसान जगह पर छोड़ना कहते थे। 2007-2008 में डॉ. थियोडोरोस पिट्सियोस की लीडरशिप में हुई फोरेंसिक जांच में, कायाडास गुफा में मिले सभी 46 कंकाल 18 से 35 साल के पुरुषों के ही थे। किसी बच्चे की हड्डी न मिलने से यह तो तय हो गया कि पहाड़ से फेंकने की कहानी झूठी थी, लेकिन सुनसान जगह पर छोड़ने का रिवाज बिल्कुल सच था।

हालांकि छोड़े गए सभी बच्चे मर ही जाते थे, ऐसा भी नहीं था। उस दौर के इतिहासकार ज़ेनोफ़ोन की किताब Hellenica और मॉडर्न इतिहासकार पॉल कार्टलेज की रिसर्च Sparta and Lakonia के अनुसार, स्पार्टा में गुलामों के समुदाय हेलॉट्स या गैर-नागरिक पेरियोइकोइ अक्सर उन बच्चों को उठा लेते थे। बाद में वे इन बच्चों को अपने बच्चे की तरह पालते थे या खेतों में काम कराने वाले गुलाम की तरह रखते थे।

और जिन बच्चों में बहुत मामूली शारीरिक कमी होती थी, उन्हें परिवार छोड़ता नहीं था। लेकिन बड़े होने पर उन्हें स्पार्टा की पूरी नागरिकता नहीं दी जाती थी। उन्हें हाइपोमायनीस यानी सामाजिक अधिकारों से वंचित दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था । इन्हें वोट देने या नागरिक सभाओं में बैठने का हक नहीं था। हालांकि इसका एक बड़ा एक्सेप्शन थे स्पार्टा के राजा एगेसिलाउस द्वितीय; ज़ेनोफ़ोन ने अपनी किताब Agesilaus में लिखा है कि बचपन से एक पैर से लंगड़े होने के बावजूद, राजपरिवार के प्रभाव की वजह से उन्हें छूट मिली थी और उन्होंने अपनी कड़ी मिलिट्री काबिलियत साबित करके 41 सालों तक स्पार्टा पर राज किया था।

स्पार्टन सोच की मनोवैज्ञानिक बुनियाद

दर असल स्पार्टन्स के इस बर्ताव के पीछे एक खास तरह की माइंडसेट काम करती थी। वे कट्टर राष्ट्र-केंद्रित सोच  और उपयोगितावाद में यकीन रखते थे। स्पार्टा में किसी इंसान का अपना कोई पर्सनल वजूद नहीं था; बच्चे को राज्य की प्रॉपर्टी माना जाता था।

वहाँ समाज को सिर्फ इसी पैमाने पर चलाया जाता था कि–इंसान की ज़िंदगी की वैल्यू सिर्फ उसकी मिलिट्री और शारीरिक काबिलियत में है। अगर कोई इंसान समाज को मजबूत योद्धा न दे सके या खुद जंग न लड़ सके, तो राज्य की नज़र में उसका ज़िंदा रहना बेमतलब था। इसीलिए बच्चे के लिए माता-पिता के प्यार या दया भाव को एक तरह का सामाजिक अपराध या इंसानी कमजोरी माना जाता था।

इतिहास के आईने में: मॉडर्न समाज में कमजोर बच्चों की हक़ीक़त

स्पार्टन्स के इतिहास से सीख लेकर अगर हम खुद को देखें, तो एक सवाल खड़ा होता है। क्या हम आज सच में उनसे ज़्यादा सभ्य हुए हैं? आज भले ही कमजोर बच्चे को सीधे पहाड़ से नीचे न फेंका जाता हो, लेकिन हमारे परिवारों में स्लो लर्नर्स और स्पेशल नीड्स वाले बच्चों का हाल आज भी काफी दुखद है।

उस दौर के स्पार्टन्स को परफ़ेक्ट योद्धा की तलाश थी, तो आज के पेरेंट्स को सिर्फ टॉपर या डॉक्टर चाहिए। नतीजा यह होता है कि बच्चा अगर पढ़ाई न समझ पाए या उम्मीदों पर खरा न उतरे, तो उसके साथ अनदेखी और बदसलूकी शुरू हो जाती है।

कोई बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर हो, तो कई परिवार उसे समाज से छुपाकर घर में ही बंद रखते हैं। यह भी स्पार्टन्स के हाइपोमायनीस की तरह बच्चे को अलग-थलग करने का एक मॉडर्न रूप है।

इसके अलावा, पढ़ाई न कर पाने पर बच्चों के साथ मारपीट करना और तुमसे कुछ नहीं होगा जैसे तानों से मेंटल टॉर्चर करना मासूम बच्चों का कॉन्फिडेंस पूरी तरह तोड़ देता है। यह रवैया किसी सुनसान जगह पर बच्चे को छोड़ आने से कम क्रूर नहीं है।

जागती ज़मीर के सामने एक असहज सवाल

इतिहास में एक बड़ा सबक छिपा है–इंसान की उपयोगिता से उसके जीने का हक तय करने वाले जिस क्रूर समाज को स्पार्टन्स ने बनाया था, इतिहास ने उसे कभी माफ नहीं किया। लेकिन आज टेक्नोलॉजी के इस दौर में भी जब कोई पेरेंट्स अपने स्लो लर्नर या स्पेशल नीड्स वाले बच्चे को प्यार देने के बजाय मेंटल टॉर्चर करते हैं, तो साबित होता है कि सोच के मामले में हम आज भी उसी प्राचीन असभ्य स्पार्टा में अटके हुए हैं। किसी बच्चे की असली वैल्यू उसके रिपोर्ट कार्ड या शारीरिक बनावट में नहीं, बल्कि उसकी इंसानी ज़िंदगी में है। जो समाज या परिवार अपने कमजोर बच्चे को प्यार से नहीं संभाल सकता, वह कितना भी आगे निकल जाए, इंसानियत के मामले में पूरी तरह दिवालिया है।