9 Dangerous Ancient Sciences Emperor Ashoka Hid From the World

ईसा पूर्व 261 की बात है। दक्षिण भारत के कलिंग राज्य में भयानक युद्ध हुआ। मौर्य साम्राज्य की विशाल सेना ने वहां चढ़ाई की थी। लेकिन जीत के बाद जश्न नहीं मनाया गया। इस युद्ध ने आगे के इतिहास को एक नया मोड़ दिया। युद्ध में लगभग एक लाख लोग मारे गए। डेढ़ लाख लोगों को बंदी बना लिया गया। इस भयानक दृश्य ने महान सम्राट अशोक को गहरे मानसिक और आत्मिक संकट में डाल दिया।

अशोक के 13वें मुख्य शिलालेख में इस पछतावे का साफ सबूत मिलता है। यह ऐतिहासिक प्रमाण आज भी मौजूद है। इस भयानक अनुभव के बाद अशोक समझ गए कि जीत सिर्फ जमीन कब्जाने में नहीं है। उन्होंने एक बड़ी बात महसूस की। इंसान की बनाई एडवांस्ड टेक्नोलॉजी गलत हाथों में पड़ सकती थी। ऐसा होने पर पूरी मानव सभ्यता पल भर में तबाह हो जाती।

इसी चिंता और दूरदर्शी की सोच के कारण एक गुप्त परंपरा की नींव पड़ी। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, अशोक ने पूरे साम्राज्य से 9 महान विद्वानों को चुना। इनकी पहचान और वजूद को हमेशा के लिए इतिहास में गुमनाम रखा गया। इन्हें दुनिया की 9 सबसे एडवांस्ड और खतरनाक विद्याएं सौंपी गईं। इस दल को नौ रहस्यमयी मानव कहा गया।

अशोक का सख्त निर्देश था। ये नौ सदस्य सदियों तक गुरु-शिष्य परंपरा से इस ज्ञान को गुप्त रखेंगे। वे इसे धीरे-धीरे आगे बढ़ाएंगे। इस ज्ञान का इस्तेमाल कभी भी पॉलिटिकल पावर या विनाशकारी कामों के लिए नहीं किया जाएगा। इंसानियत पहले इस ज्ञान को संभालने लायक समझदार बनेगी। उसके बाद ही इसे दुनिया के सामने लाया जाएगा।

सुरक्षित नौ खतरनाक विद्याएं, प्राचीन ग्रंथ और आधुनिक शब्द

इस गुप्त वैज्ञानिक समाज का लिखित सबूत होना भले ही विवादित हो। लेकिन लोककथाओं की ये 9 विद्याएं प्राचीन भारत में काल्पनिक नहीं थीं। इनके लिखित प्रमाण प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलते हैं। आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी और साइंस से तुलना करने पर इनका स्वरूप एकदम साफ हो जाता है।

पहली विद्या थी मनोवैज्ञानिक युद्ध और प्रोपेगैंडा। इसे आज साइकोलॉजिकल ऑपरेशंस और मास-प्रोपेगैंडा कहते हैं। इसका तरीका ईसा पूर्व चौथी सदी में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है।

दूसरी विद्या थी शरीर विज्ञान और स्पर्श से मारने की तकनीक। इसे आज न्यूरो-स्ट्राइक टेक्नोलॉजी और बायो-मेकैनिक्स कहते हैं। ईसा पूर्व छठी सदी में महर्षि सुश्रुत की सुश्रुत संहिता में इसका जिक्र है। वहां 107 मर्म यानी प्रेशर पॉइंट्स के बारे में बताया गया है।

तीसरी विद्या थी सूक्ष्म जीव विज्ञान और जैविक जहर। इसे आज माइक्रोबायोलॉजी और बायो-वेपन्स कहा जाता है। इसका विवरण सुश्रुत संहिता और चरक संहिता में मिलता है। वहां सूक्ष्म कृमि और गर विष यानि धीमा जहर के बारे में लिखा गया है।

चौथी विद्या थी किमियागिरी या धातुओं को बदलने का विज्ञान। इसे आज न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन और केमिकल इंजीनियरिंग कहते हैं। दूसरी सदी में नागार्जुन के ग्रंथ रसरत्नाकर में यह मौजूद है। उसमें पारे को सोने में बदलने की प्रोसेस बताई गई है।

पांचवीं विद्या थी अंतरिक्ष से संपर्क की तकनीक। इसे आज हम इंटरस्टेलर कम्युनिकेशन और एस्ट्रोफिजिक्स कहते हैं।

छठी विद्या थी एंटी-ग्रेविटी यानी हवा में उड़ने की तकनीक। इसे आज एंटी-ग्रेविटी और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग कहते हैं। इसका मेकैनिक्स 11वीं सदी के राजा भोज के ग्रंथ समरांगण सूत्रधार में लिखा है। इसके 31वें अध्याय में पारे से चलने वाले उड़न यंत्रों का जिक्र है।

सातवीं विद्या थी टाइम ट्रैवल और काल गणना। इसे आज थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और टाइम ट्रैवल कहते हैं।

आठवीं विद्या थी लाइट एनर्जी यानी किरणों को एक जगह केंद्रित करना। इसे आज डायरेक्टेड लेजर एनर्जी वेपन्स और होलोग्राफी कहा जाता है।

नौवीं विद्या थी समाज के भविष्य का अनुमान लगाने का विज्ञान। इसे आज साइकोहिस्ट्री या प्रेडिक्टिव सोशल एल्गोरिदम कहते हैं। इस गणना का गणितीय रूप 5वीं सदी के ग्रंथ आर्यभटीय में दिखता है। इसे आर्यभट्ट ने लिखा था। इसका जिक्र प्राचीन सूर्य सिद्धांत में भी मिलता है।

पश्चिमी साहित्य, टैलबॉट मुंडी और अंतरराष्ट्रीय असर

इस रहस्यमयी समाज की कहानी सिर्फ भारत की लोककथाओं तक सीमित नहीं रही। यूरोप और अमेरिका के इतिहास पर भी इसका गहरा असर दिखा। पश्चिमी दुनिया में इस रहस्य को ब्रिटिश लेखक टैलबॉट मुंडी सामने लाए। 1927 में उनकी प्रसिद्ध किताब द नाइन अननोन छपी थी। इसमें उन्होंने इस गुप्त समाज का जिक्र किया था।

तत्कालीन ब्रिटिश पीरियड पर 1909 से 1915 के बीच मुंडी भारत में कार्यरत थे। यहां उन्होंने स्थानीय पंडितों और साधुओं से यह लोककथा सुनी। बाद में 1920 के दशक में वे अमेरिका की थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े। यह संस्था एक ही बात मानती थी। इसके अनुसार भारत में कुछ गुप्त गुरु हैं। वे दुनिया का अनमोल ज्ञान बचा रहे हैं। मुंडी ने भारतीय लोककथा और थियोसोफी के विचारों को मिलाकर यह किताब लिखी थी।

इसके बाद 1960 में फ्रांसीसी रिसर्चर्स लुई पावेल्स और जैक्स बर्गियर की किताब आई। उनकी किताब द मॉर्निंग ऑफ द मैजिशियंस में एक दावा था। इसमें 10वीं सदी के पोप सिलवेस्टर द्वितीय का नाम था। साथ ही 13वीं सदी के ब्रिटिश दार्शनिक रोजर बेकन का जिक्र था। कहा जाता है ये दोनों इस गुप्त ज्ञान के संपर्क में आए थे।

पोप सिलवेस्टर स्पेन की यात्रा पर गए थे। कहा जाता है कि वहां उन्होंने पीतल का एक (यंत्र-मानव) बनाया। वह बोल सकता था। माना जाता है कि इसका फॉर्मूला भारत के इसी गुप्त समाज से यूरोप पहुंचा था।

एटम बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने न्यूक्लियर टेस्ट के बाद भगवद्गीता का श्लोक याद किया था। उस समय भी कई विचारकों ने भारत की इसी प्राचीन गुप्त विद्या का जिक्र किया था।

ऐतिहासिक सीमाएं, सबूतों की कमी और अर्बन लेजेंड

1927 की टैलबॉट मुंडी की किताब और 1920 के थियोसोफिकल साहित्य को छोड़ दें, तो कोई सीधा लिखित सबूत नहीं मिलता। इन नौ मानवों का जिक्र और कहीं नहीं है।

सम्राट अशोक के सारनाथ, गिरनार या धौली में कई शिलालेख मिले हैं। इनमें धर्म प्रचार, अहिंसा और समाज कल्याण की बातें हैं। लेकिन किसी गुप्त वैज्ञानिक संगठन का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं मिलता। कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। इसी वजह से इतिहासकार इसे एक दिलचस्प अर्बन लेजेंड यानी प्रचलित लोककथा मानते हैं।

हालांकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मौर्य साम्राज्य के गुप्तचर नेटवर्क का जिक्र मिलता है। इसे नकारा नहीं जा सकता। कुछ इतिहासकारों का एक मानना है। उनके अनुसार इसी गुप्तचर व्यवस्था की कहानियां आगे चलकर लोककथा बन गईं।

आधुनिक टेक्नोलॉजी बनाम प्राचीन विद्या

पुरानी कहानियों और सबूतों की कमी को एक तरफ रख दें और आज की मॉडर्न साइंस की तरफ देखें। तब अशोक की सोच की प्रासंगिकता खुद-ब-खुद समझ आती है। प्राचीन ग्रंथों की नौ विद्याएं–जैसे प्रोपेगैंडा, मर्म प्रहार, किमियागिरी या एंटी-ग्रेविटी, आज के विज्ञान से बहुत मिलती-जुलती हैं। ये आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी से हूबहू मेल खाती हैं। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वॉर, जीन एडिटिंग, बायोलॉजिकल वेपन्स, स्पेस रिसर्च और न्यूक्लियर पावर शामिल हैं।

हजारों साल पहले इन विद्याओं को इंसानियत के लिए खतरा माना गया था। लेकिन जरा आप सोच के देखिए, आज दुनिया ठीक उन्हीं टेक्नोलॉजीज के मोड़ पर खड़ी है। इंसानियत आज खुद अपनी ही बनाई तकनीकों से खतरे में नजर आती है। यह सच्चाई हमें नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है। अशोक के नौ रहस्यमयी मानवों की कहानी क्या सिर्फ एक लेखक की कल्पना थी? या इसके पीछे एक दूरदर्शी सम्राट की व्यावहारिक सोच छुपी थी?

इतिहास शायद कभी इन नौ लोगों के नाम का सबूत न दे पाए। लेकिन आज की अनियंत्रित टेक्नोलॉजी लोगों के मन में एक सवाल जरूर छोड़ती है। क्या सम्राट अशोक ने ढाई हजार साल पहले ही साइंस के इस भयानक रूप को देख लिया था? यह कहानी भले ही काल्पनिक लगे। लेकिन आज की हकीकत के बहुत करीब होने के कारण यह एकदम सच्ची महसूस होती है।