Napoleon’s Final Days: Poison, Medical Error, or Cancer?
1815 के 15 अक्टूबर। दक्षिण अटलांटिक महासागर के एक सुनसान वॉल्केनिक आइलैंड सेंट हेलेना में हारे हुए फ़्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने कदम रखा। वॉटरलू की लड़ाई के बाद बेहद ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य ने बहुत सोच-समझकर उन्हें इस दूरदराज़ द्वीप पर निर्वासन में भेज दिया। उनका मक़सद यह था कि यूरोप की जियोपॉलिटिक्स में नेपोलियन के वापस आने की कोई गुंजाइश न रहे। लेकिन इस निर्वासन के सिर्फ़ छह साल बाद, 5 मई 1821 को, महज़ 51 वर्ष की उम्र में इस बेहद शक्तिशाली योद्धा का जीवन हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
दुनिया को हिला देने वाले नेपोलियन के इस दर्दनाक अंत ने दुनिया भर में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया: सेंट हेलेना के लॉन्गवुड हाउस के अंधेरे कमरे में असल में क्या हुआ था? क्या यह सिर्फ़ एक स्वाभाविक बीमारी थी, या इसके पीछे कोई गुप्त ब्रिटिश साज़िश, धीमा पॉइजनिंग या डॉक्टरों की जानलेवा भूल थी? आखिर उनके जीवन के आख़िरी दिनों में क्या हुआ था?
सेंट हेलेना में जीवन और लॉन्गवुड हाउस का माहौल
सेंट हेलेना में नेपोलियन के रहने के लिए तय जगह का नाम लॉन्गवुड हाउस था, जो पहले एक फार्महाउस के रूप में इस्तेमाल होता था। यह जगह समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित थी। यहाँ साल भर तेज़ हवाएँ चलती थीं और मौसम में भारी नमी व सीलन बनी रहती थी। उस समय के ब्रिटिश गवर्नर सर हडसन लो ने नेपोलियन पर कड़ा सिक्योरिटी घेरा लागू कर दिया था। वहाँ लगातार गार्ड्स तैनात रहते थे, उनकी पर्सनल चिट्ठियों की जाँच होती थी और आने-जाने की आज़ादी छीन ली गई थी। इस वजह से सम्राट मानसिक रूप से गहरे डिप्रेशन में चले गए।
1818 से नेपोलियन की तबियत बिगड़ने के संकेत उस दौर की डायरियों से मिलते हैं। उनके साथी काउंट इमैनुएल डी लास केसेस और डॉक्टर बैरी ओ'मीरा ने अपने रिकॉर्ड्स में लिखा है कि सम्राट लगातार उदास होते जा रहे थे और पेट के दर्द से परेशान थे। 1820 के अंत तक यह दर्द बहुत ज़्यादा बढ़ गया। उन्हें लगातार उल्टी होना, बहुत पसीना आना, चक्कर आना और पेट में जलन जैसी तकलीफ़ें होने लगीं।
सालों से अजेय रहे सम्राट अपनी शारीरिक ताकत खोने के बाद खुद यह समझ चुके थे, कि उनका आख़िरी समय पास आ गया है।
जीवन के आख़िरी तीन सालों की कहानी
नेपोलियन के साथ द्वीप पर उनके कुछ वफ़ादार साथी क़ैद थे। इनमें ग्रैंड मार्शल हेनरी-गैतियन बर्ट्रेंड, काउंट डी मोंथोलॉन और डॉक्टर फ़्रांस्वा एंटोमार्की शामिल थे। इनके लिखे नोट्स और ब्रिटिश गवर्नर सर हडसन लो के सरकारी डॉक्यूमेंट्स से नेपोलियन के आख़िरी सालों का पूरा ब्योरा मिलता है।
जुलाई 1818: नेपोलियन के पर्सनल आयरिश डॉक्टर बैरी ओ'मीरा ने गवर्नर हडसन लो को साफ़-साफ़ चेतावनी दी थी। उन्होंने बताया कि लॉन्गवुड हाउस की सीलन और यह क़ैद नेपोलियन के लिवर व पेट की बीमारी को जानलेवा बना रही है। इससे नाराज़ होकर हडसन लो ने जुलाई में ओ'मीरा को द्वीप से बाहर निकाल दिया। ओ'मीरा के जाने के बाद ब्रिटिश गार्ड्स ने घर के बेहद पास पहरा देना शुरू कर दिया। इसके विरोध में नेपोलियन ने बाहर टहलना और घोड़े की सवारी करना पूरी तरह बंद कर दिया।
ग्रैंड मार्शल बर्ट्रेंड ने अपनी डायरी में लिखा कि 1818 के अंत में नेपोलियन के पैरों में सूजन आने लगी, पेट में तेज़ दर्द हुआ और शरीर बहुत कमज़ोर पड़ गया।
जनवरी-अगस्त 1819: डॉक्टर ओ'मीरा के जाने के बाद पूरे 9 महीने तक नेपोलियन के पास कोई परमानेंट डॉक्टर नहीं था। जनवरी में ब्रिटिश नेवी के सर्जन डॉक्टर जॉन स्टोक्स ने कई बार उनकी जाँच की और लिवर व पेट की गंभीर बीमारी की बात कही। लेकिन गवर्नर लो ने उन्हें भी कोर्ट मार्शल करवाकर नौकरी से निकाल दिया।
1819 के मध्य में नेपोलियन ने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से बिज़ी रखने के लिए लॉन्गवुड हाउस के चारों ओर सब्ज़ियों और फूलों का गार्डन बनाना शुरू किया। वहाँ वे खुद ही मिट्टी खोदने का काम करते थे।
17 सितंबर 1819: नेपोलियन की माँ और फ़्रांसीसी राजपरिवार की रिक्वेस्ट पर रोम से कॉर्सिकन डॉक्टर फ़्रांस्वा कार्लो एंटोमार्की और दो बुज़ुर्ग पादरी सेंट हेलेना पहुँचे। डॉक्टर एंटोमार्की को पैथोलॉजी की अच्छी जानकारी थी, लेकिन नेपोलियन की असली बीमारी पहचानने का अनुभव कम था।
जुलाई-सितंबर 1820: इस समय से नेपोलियन के लिए गार्डनिंग करना या टहलना भी नामुमकिन हो गया। लगातार उल्टी, तेज़ बुखार, ठंड लगना और पेट में भयंकर जलन उनका रोज़ का दर्द बन गया।
4 अक्टूबर 1820: यह एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तारीख़ है। इस दिन नेपोलियन आख़िरी बार घोड़े पर सवार होकर लॉन्गवुड हाउस के बाहर सैंडी बे की तरफ़ गए थे। इसके बाद वे कभी भी लॉन्गवुड हाउस की बाउंड्री से बाहर नहीं निकल सके।
नवंबर-दिसंबर 1820: काउंट मोंथोलॉन के रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि नवंबर 1820 से नेपोलियन ज़्यादातर समय बिस्तर पर ही पड़े रहते थे। सॉलिड खाना खाना, उनके लिए लगभग नामुमकिन हो गया था; उन्हें सिर्फ़ लिक्विड सूप और दूध दिया जाता था।
जनवरी-मार्च 1821: 1821 की शुरुआत से ही नेपोलियन को लगातार काले रंग के तरल उल्टी होने लगी। डॉक्टर एंटोमार्की ने अपनी डायरी में लिखा है कि सम्राट दिनों तक भयंकर दर्द से तड़पते रहते थे।
15 अप्रैल 1821: मौत पास देखकर नेपोलियन ने काउंट मोंथोलॉन को बुलाकर अपनी वसीयत लिखवाई। इसमें उन्होंने लिखा: "मैं ब्रिटिश ऑलिगार्की और उनके किराए के हत्यारों के हाथों असमय मारा जा रहा हूँ... लेकिन फ़्रांसीसी जनता मुझे माफ़ कर देगी।"
3 मई 1821: नेपोलियन की गंभीर कब्ज़ को दूर करने के लिए डॉक्टर एंटोमार्की और ब्रिटिश मिलिट्री सर्जन डॉक्टर अर्नॉट ने उन्हें 10 ग्रेन कैलमेल की डोज़ दी। मर्करी वाली यह स्ट्रॉन्ग दवा लेते ही उनके पेट के अंदर भयंकर ब्लीडिंग शुरू हो गई और वे बेहोश हो गए।
4 मई 1821: 4 मई को पूरे दिन नेपोलियन गहरे कोमा और बेसुध हालत में रहे। बर्ट्रेंड और मोंथोलॉन ने अपनी डायरी में रात के अंत में उनके मुँह से निकला आख़िरी शब्द दर्ज किया: 'तेत दारेमे'। फ़्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ है सेना का प्रमुख।
5 मई 1821: शाम के समय नेपोलियन की सांसें बहुत धीमी होने लगीं। सेंट हेलेना के ऑफिशियल रिकॉर्ड्स और डॉक्टरों के मेमोरैंडम में दर्ज है कि 5 मई 1821, शनिवार की शाम 5:49 बजे फ़्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी आख़िरी सांस ली।
1821 की ऑटोप्सी और शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट
मौत के ठीक अगले ही दिन, 6 मई 1821 को लॉन्गवुड हाउस में नेपोलियन के शव की ऑटोप्सी की गई। इस प्रोसेस में नेपोलियन के पर्सनल फ़्रांसीसी डॉक्टर फ़्रांस्वा कार्लो एंटोमार्की और सात ब्रिटिश मिलिट्री सर्जन शामिल थे। ऑटोप्सी का मुख्य मक़सद यह पक्का करना था कि उनकी मौत किसी अप्राकृतिक कारण से तो नहीं हुई है।
डॉक्टरों की टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सम्राट के पेट में एक गंभीर घाव यानी पेप्टिक अल्सर था। बाद में यही अल्सर एक बड़े कैंसर ट्यूमर में बदल गया। पेट की दीवार में छेद होने और अंदरूनी ब्लीडिंग के निशान भी मिले थे। ऐतिहासिक आँकड़ों के मुताबिक नेपोलियन के पिता कार्लो बोनापार्ट की मौत भी 1785 में पेट के कैंसर से ही हुई थी। इसलिए डॉक्टरों ने माना कि जेनेटिक कारणों से हुआ पेट का कैंसर ही उनकी मौत की मुख्य वजह था।
आर्सेनिक पॉइजनिंग थ्योरी: एक रोमांचक विवाद
ऑफिशियल ऑटोप्सी के बाद भी नेपोलियन की मौत को लेकर कई कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज़ सामने आने लगीं। यह विवाद 1955 में तब बढ़ा, जब स्वीडिश टॉक्सिकोलॉजिस्ट डॉक्टर स्टेन फ़ॉरशफ़ुड ने नेपोलियन के पर्सनल अटेंडेंट लुई मार्चैंड की डायरी पढ़ी। उन्होंने देखा कि मार्चैंड द्वारा बताए गए लक्षण आर्सेनिक पॉइजनिंग के सिम्टम्स से काफ़ी मिलते-जुलते थे।
इसके बाद 1961 में डॉक्टर फ़ॉरशफ़ुड ने ग्लासगो यूनिवर्सिटी के फॉरेंसिक एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर हैमिल्टन स्मिथ के साथ मिलकर नेपोलियन के बालों की जाँच की। उन्होंने न्यूट्रॉन एक्टिवेशन एनालिसिस नाम की न्यूक्लियर टेक्निक का इस्तेमाल किया। इस टेस्ट में नेपोलियन के बालों में आम इंसानों की तुलना में 13 गुना ज़्यादा आर्सेनिक मिला। इसी आधार पर यह दावा किया गया कि अंग्रेजों के गुप्त आदेश पर काउंट डी मोंथोलॉन ने खाने में आर्सेनिक मिलाकर सम्राट को ज़हर दिया था।
इसके अलावा एक एनवायरनमेंटल थ्योरी भी सामने आई। लॉन्गवुड हाउस के बेडरूम के हरे वॉलपेपर में शील्स ग्रीन नाम का डाई लगा था, जो तांबे और आर्सेनिक का कम्पाउंड था। सेंट हेलेना के सीलन भरे माहौल में फंगस के कारण इस डाई से ट्राइमिथाइलआर्सिन नाम की ज़हरीली गैस निकलती थी। कई लोगों का मानना है कि इस हवा में लंबे समय तक सांस लेने से नेपोलियन के शरीर में आर्सेनिक जमा हो गया था।
मॉडर्न साइंस और 2007-2008 की इंटरनेशनल रिसर्च
लंबे समय से चली आ रही इस पॉइजनिंग थ्योरी को 2007 और 2008 में मॉडर्न फॉरेंसिक साइंस ने पूरी तरह खारिज कर दिया। इटैलियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फ़िज़िक्स के रिसर्चर्स ने नेपोलियन की अलग-अलग उम्र के बालों के सैंपल टेस्ट किए। इनमें उनके बचपन (1783), इटली कैंपेन (1804), एल्बा द्वीप के दिनों (1814) और मौत के बाद के बाल शामिल थे। यहाँ तक कि उनकी पत्नी जोसेफिन और बेटे नेपोलियन द्वितीय के बालों का भी टेस्ट किया गया।
रिसर्च में पाया गया कि नेपोलियन के बचपन और मौत के समय के बालों में आर्सेनिक की मात्रा लगभग एक जैसी थी। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि 19वीं सदी के आम लोगों के बालों में आज की तुलना में 100 गुना ज़्यादा आर्सेनिक होता था। उस ज़माने में पेंटिंग्स, कॉस्मेटिक्स, दवाओं और शराब को सुरक्षित रखने में आर्सेनिक का बड़ा इस्तेमाल होता था। इसलिए नेपोलियन के शरीर में मिला आर्सेनिक किसी खास ज़हर का सबूत नहीं देता।
इसके अलावा 2005 और 2007 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ कैंसर में पब्लिश एक रिसर्च में नेपोलियन के कपड़ों की साइज़ की जाँच की गई। इससे पता चला कि 1818 से 1821 के बीच उनकी कमर 110 सेंटीमीटर से घटकर 91 सेंटीमीटर रह गई थी। आख़िरी महीनों में उनका वज़न भी 12 से 15 किलो कम हुआ था। मॉडर्न मेडिकल साइंस के मुताबिक इतनी तेज़ी से वज़न गिरना और पेट का गंभीर नुकसान सिर्फ़ स्टेज-4 कैंसर में ही मुमकिन है।
मेडिकल मिस्टेक्स: ताबूत में आख़िरी कील
हालाँकि कैंसर ही मुख्य वजह था, लेकिन मेडिकल-हिस्ट्री का एनालिसिस बताता है कि डॉक्टरों के इलाज ने उनके आख़िरी पलों को और ज़्यादा दर्दनाक बना दिया था। 1821 की शुरुआत से ही नेपोलियन गंभीर कब्ज़ और पेट दर्द से जूझ रहे थे।
मौत से दो दिन पहले 3 मई 1821 को डॉक्टरों ने उन्हें कैलमेल नाम की दवा की भारी डोज़ दी। साथ में पोटैशियम टार्टरेट'm भी दिया गया। यह दवा लेते ही सम्राट के शरीर में भयंकर रिएक्शन हुआ। मॉडर्न एक्सपर्ट्स के मुताबिक दोनों दवाओं के रिएक्शन से मर्करी टॉक्सिसिटी पैदा हो गई और शरीर का इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगड़ गया।
इससे नेपोलियन की हार्टबीट पर बहुत बुरा असर पड़ा और पेट के अंदर तेज़ ब्लीडिंग शुरू हो गई। डॉक्टरों की दवा ने दर्द कम करने के बजाय ब्लीडिंग बढ़ा दी, जिससे सम्राट की मौत और जल्दी हो गई।
लॉन्गवुड हाउस के आख़िरी अध्याय का समाधान
दक्षिण अटलांटिक के सुनसान द्वीप की लॉन्गवुड हाउस में 1821 की उस रात जो हुआ, वह कोई कहानी नहीं थी। हालाँकि इसका पूरा सच आज भी पूरी तरह से सामने नहीं आ पाया है।
मॉडर्न फॉरेंसिक सबूतों से यही इशारा मिलता है कि सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट किसी बाहरी दुश्मन से नहीं हारे थे। वे अपने शरीर के अंदर पनप रहे कैंसर, सेंट हेलेना के ख़राब माहौल और डॉक्टरों के गलत फ़ैसलों की वजह से जान गँवा बैठे।
2021 में इंटरनेशनल रिसर्चर्स की एक टीम ने मॉडर्न पैथोलॉजिकल रिव्यू के आधार पर इस कैंसर थ्योरी को ही सबसे सटीक कारण माना है।
फिर भी यह इतिहास पूरी तरह से विवादों से मुक्त नहीं है। कई हिस्टोरियंस आज भी पॉइजनिंग की गुंजाइश को पूरी तरह ख़ारिज नहीं करते। कुछ लोगों का मानना है कि इलाज में इस्तेमाल हुए आर्सेनिक, मर्करी और एंटीमनी के मिक्सचर ने उनकी मौत को तेज़ कर दिया था। इसलिए इसे पूरी तरह से नैचुरल डेथ कहना मुश्किल है। नतीजतन, इस महान विजेता की जीवन यात्रा का अंत इतिहास और विज्ञान का एक ऐसा अनसुलझा रहस्य बनकर रह गया है, जिस पर आज भी रिसर्च जारी है।
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