Did Religion Exist Before Farming? The Shocking Truth of Gobekli Tepe

जमीन के नीचे लगभग 12 हजार सालों से एक ऐसा सच दबा हुआ था, जिसने सभ्यता की शुरुआत को लेकर इंसानों की सभी मान्यताओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। हजारों सालों से यह जगह तुर्की के साउथ-ईस्ट रीजन में एक शांत पहाड़ी टीले के रूप में खड़ी थी। इसके नीचे इतिहास का इतना बड़ा सच छिपा हो सकता है, इसकी कल्पना पहले किसी ने नहीं की थी।

असल में, सदियों तक लोकल लोग इसे सिर्फ एक साधारण मिट्टी का टीला ही मानते थे। इस एरिये में पानी का कोई परमानेंट सोर्स या झरना नहीं था। इसलिए प्राचीन काल में इंसान यहाँ पक्के तौर पर नहीं बसे थे। पहाड़ी इलाका होने की वजह से मॉडर्न आर्कियोलॉजिस्ट्स की नजर भी इस जगह से काफी समय तक बची रही। लेकिन 1990 के दशक में एक बड़ा बदलाव आया। एक जर्मन आर्कियोलॉजिस्ट की नजर इस पहाड़ी के बाहर निकले पत्थरों की चट्टानों पर पड़ी। यहीं से मानव सभ्यता के सबसे पुराने रहस्य का पर्दा उठना शुरू हुआ।

गलतफहमी से पुरातात्विक सच की खोज

गोबेकली तेपे की हिस्ट्री सिर्फ पत्थरों की कहानियों तक सीमित नहीं है। इसके साथ दुनिया के कई मशहूर रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के नाम और उनके साइंटिफिक ऑब्जर्वेशन जुड़े हुए हैं। हालांकि, शुरुआत में वैज्ञानिकों की नजर भी इस अनोखी जगह को पहचानने में गलती कर बैठी थी।

1963 में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो और तुर्की की इस्तांबुल यूनिवर्सिटी की एक जॉइंट टीम ने इस इलाके में पहला सर्वे किया था। जमीन से थोड़ा बाहर निकले चूना पत्थर के प्राचीन टुकड़ों को देखकर उन्होंने अंदाजा लगाया। उन्हें लगा कि यह शायद मध्यकालीन समय का कोई बाइजेंटाइन मिलिट्री बेस या कोई साधारण कब्रिस्तान है। इलाके में किसी परमानेंट इंसानी बस्ती के निशान नहीं मिले। इस वजह से उन्होंने इसे खास इम्पोर्टेंस नहीं दिया और वे वहां से लौट गए। इस तरह अगले तीन दशकों तक यह साइट इंसानी सोशल हिस्ट्री की नजरों से दूर और अनजान बनी रही।

आखिरकार 1994 में मामला चर्चे में आया । उस समय यहां जर्मन आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. क्लॉस श्मिट की एंट्री होती है। जर्मनी का नामी रिसर्च ऑर्गनाइजेशन है जर्मन आर्किओलॉजिकल इंस्टीट्यूट। इसी संस्था के शोधकर्ता डॉ. क्लॉस श्मिट ने शैनलिउरफा शहर से लगभग 15 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित इस टीले की फिर से जांच करने का फैसला किया। एक लोकल किसान के पुराने एक्सपीरियंस और जमीन के ऊपर पत्थरों की अनोखी बनावट को देखकर डॉ. श्मिट अस्वस्थ हो गए। वे समझ गए थे कि जमीन के नीचे बहुत इम्पोर्टेंट सच छिपा है। इसके बाद शैनलिउरफा म्यूजियम और जर्मन आर्किओलॉजिकल इंस्टीट्यूट के जॉइंट प्रयास से इस जगह पर बड़े पैमाने पर सरकारी खुदाई का काम ऑफिशियली शुरू हुआ।

खुदाई की शुरुआत में ही वैज्ञानिकों को पत्थरों के विशाल स्ट्रक्चर मिलने लगे। इन्हें देखकर पूरी दुनिया के एक्सपर्ट्स हैरान रह गए। खुदाई में मिले जैविक अवशेषों पर मॉडर्न रेडियोकार्बन डेटिंग टेस्ट किया गया। इससे वैज्ञानिकों ने यह पक्का किया कि इस अद्भुत मंदिर का निर्माण आज से लगभग 11,600 साल पहले हुआ था। इसका समय 9600 ईसा पूर्व से 8000 ईसा पूर्व के बीच का है। इसका मतलब है कि इंग्लैंड का मशहूर स्टोनहेंज बनने से लगभग छह हजार साल पहले और मिस्र के पिरामिडों के निर्माण से लगभग सात हजार साल पहले, इंसानों ने इस विशाल मंदिर परिसर को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से तैयार किया था।

मेगालिथिक आर्किटेक्चर और प्राचीन चमत्कार

गोबेकली तेपे के अवशेष इंसान के आर्किटेक्चरल स्किल के सबसे पुराने सबूत हैं। वहां जमीन के नीचे से एक-एक करके T-शेप के विशाल खंभे निकलने लगे। इन खंभों से कई गोलाकार मंदिर परिसर बनाए गए थे। एक-एक खंभे की ऊंचाई लगभग 16 से 20 फीट और वजन लगभग 10 से 20 टन तक था।

आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी और बड़ी-बड़ी क्रैनों के बिना इन विशाल पत्थरों को खदानों से काटा गया और तय जगह पर खड़ा किया गया। यह कैसे संभव हुआ, इसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया। जिस समय इसे बनाया गया था, तब इंसानों के पास लोहे जैसा कोई धातु का औज़ार नहीं था। यहां तक कि पहिए का उपयोग भी तब शुरू नहीं हुआ था। सिर्फ सख्त चकमक पत्थर से घिस-घिसकर इन हजारों टन वजनी चूना पत्थरों को तराशा गया और उन पर नक्काशी की गई थी।

खंभों पर उकेरे गए आर्टवर्क ने रिसर्चर्स को और भी ज्यादा हैरान किया। हर T-शेप के पत्थर पर बहुत ही बारीकी से अलग-अलग जानवरों की मूर्तियां और चित्र बनाए गए थे। वहां जहरीले बिच्छू, लोमड़ी, दहाड़ते शेर, रेंगते सांप, जंगली सांड और विशाल पंख फैलाए गिद्धों की आकृतियां साफ देखी जा सकती हैं। कुछ खंभे तो इंसानी शरीर की शेप में ही बने हैं। जिनके दोनों तरफ इंसानी हाथ और कमर के बेल्ट के निशान बने हुए हैं। यह कोई साधारण सजावट नहीं थी, बल्कि उस दौर के शिकारी इंसानों की धार्मिक मान्यताओं और सोच की पवित्र सिंबल थी।

लेकिन इस सबूत का सबसे रोमांचक पहलू बिल्कुल दूसरी जगह छिपा था। इस विशाल परिसर में डॉ. क्लॉस श्मिट की टीम ने कई दशकों तक खुदाई की। शुरुआत में इंसानों के परमानेंट रहने के कोई साफ सबूत नहीं मिले। इस वजह से उन्होंने इसे एक मूलरूप से धार्मिक केंद्र माना था।

हालांकि, हाल के सालों में उनके सहयोगी ली क्लेयर और अन्य रिसर्चर्स ने नई खुदाई की है। इसमें कुछ ऐसे स्ट्रक्चर मिले हैं, जिनसे लगता है कि इस जगह पर सीमित रूप से लोग रहते भी होंगे। इस वजह से यह पूरी तरह से बिना आबादी वाला धार्मिक स्थल था या आंशिक रूप से बस्ती भी थी–इस सवाल पर वैज्ञानिकों के बीच आज भी अलग-अलग राय है। 

इसके अलावा खुदाई के दौरान हजारों जंगली जानवरों की हड्डियां मिली हैं। इनमें जंगली हिरण, जंगली सांड, गज़ेल और कई तरह के पक्षी शामिल थे। इतनी बड़ी तादाद में जानवरों की हड्डियां यह साबित करती हैं कि यह आम लोगों के परमानेंट रहने की जगह नहीं थी। दूर-दूर से हजारों प्राचीन शिकारी इंसान तय समय पर इस पवित्र जगह पर इकट्ठा होते थे, बड़े धार्मिक अनुष्ठान करते थे और सब मिलकर दावत मनाते थे।

वैज्ञानिकों की पुरानी थ्योरी का बदलना

क्या गोबेकली तेपे की खोज ने मानव इतिहास की सबसे पुरानी और मानी हुई वैज्ञानिक धारणा को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है? दुनिया अब तक पुरातत्वविद ऑस्ट्रेलियाई पुरातत्वविद वी. गॉर्डन चाइल्ड द्वारा दिए गए ऐतिहासिक नियम को फॉलो करते आ रहे थे। उस पुरानी थ्योरी के मुताबिक माना जाता था कि इंसान पहले खेती सीखता है। जब अनाज पर्याप्त होता है, तब वह एक जगह परमानेंट रूप से रहने लगता है। फिर वह शहर बसाता है और एक ऑर्गनाइज्ड समाज के जरिए धर्म और मंदिरों की स्थापना करता है।

लेकिन गोबेकली तेपे ने वैज्ञानिकों की इस पुरानी थ्योरी पर क्वेश्चन मार्क लगा दिया। वहां खेती की व्यवस्था या परमानेंट बस्ती बनने से पहले ही एक विशाल मंदिर का स्ट्रक्चर खड़ा हो चुका था। उन्होंने एक इम्पैक्टफुल थ्योरी रखी। उनके मुताबिक शहर बनने से पहले शायद मंदिर बना था। यानी खेती की जरूरत से ज्यादा, साझा धार्मिक विश्वास ने इंसानों को एक जगह इकट्ठा होकर समाज बनाने के लिए इन्फ्लुएंस किया होगा। यह पुरातत्व की दुनिया में बहुत चर्चित व्याख्या है। लेकिन यह अभी पूरी तरह से साबित हुआ फाइनल डिसीजन नहीं है। यह कई संभावित व्याख्याओं में से एक है, जिस पर आज भी रिसर्चर्स बहस कर रहे हैं।

गेहूं का पहला सोर्स और खेती की शुरुआत

इस मंदिर के निर्माण के साथ ही मानव सभ्यता का अगला बड़ा कदम यानी खेती की शुरुआत का मुख्य रहस्य छिपा हुआ है। हजारों शिकारी इंसानों को बिना किसी धातु के औज़ार के इतने बड़े मेगालिथिक पत्थरों को काटना और उठाना पड़ता था। इसके कारण उन्हें रोजाना भारी मात्रा में भोजन की भी जरूरत होती थी। केवल जंगली जानवरों का शिकार करके सैकड़ों मजदूरों का पेट भरना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था।

बोटैनिस्ट्स की 1997 की मॉडर्न जेनेटिक रिसर्च ने इस रहस्य का एक चौंकाने वाला साइंटिफिक जवाब दिया। गोबेकली तेपे से सिर्फ 30 किलोमीटर दूर स्थित काराकाडाग पहाड़ी के ढलानों पर वैज्ञानिकों को एक खास तरह के जंगली गेहूं की किस्म मिली। जेनेटिक टेस्ट में यह सामने आया कि आज पूरी दुनिया में जिस गेहूं की खेती हम करते हैं, उसका मूल जेनेटिक सोर्स इसी काराकाडाग पहाड़ी का जंगली गेहूं है। रिसर्चर्स के मुताबिक, गोबेकली तेपे के धार्मिक आयोजनों में हजारों लोग आते थे। उन सभी को रोजाना भोजन कराना जरूरी था। इसके लिए इंसान मजबूर होकर उस जंगली गेहूं को उगाने और खेती करने लगे। यानी धर्म की जरूरत से ही मानव सभ्यता की पहली ऑर्गनाइज्ड खेती का जन्म हुआ था।

रहस्यमयी अंत और ऑफिशियल मुहर

गोबेकली तेपे की हिस्ट्री जितनी हैरान करने वाली है, इसका अंत भी उतना ही रहस्यमयी है। एक लंबे समय तक धार्मिक केंद्र के रूप में इस्तेमाल होने के बाद, लगभग 8000 ईसा पूर्व के आसपास लोग रहस्यमयी तरीके से इस पूरे पवित्र परिसर को छोड़कर चले गए।

लंबे समय से यह माना जाता था कि प्राचीन इंसानों ने खुद सैकड़ों टन मिट्टी और पत्थर लाकर इस पूरे परिसर को जमीन के नीचे दफना दिया था। डॉ. श्मिट ने इसे एक धार्मिक समापन समारोह के रूप में समझाया था। हालांकि, हाल के जियोलॉजिकल एनालिसिस में कुछ रिसर्चर्स का दावा है कि जमीन के नीचे दबने की यह प्रोसेस आंशिक रूप से नेचुरल लैंडस्लाइड के कारण भी हो सकती है। इसलिए यह पूरी तरह से जानबूझकर किया गया था या नेचुरल था, यह विवाद अभी तक सुलझ नहीं पाया है।

बाद में 2018 में यूनेस्को ने गोबेकली तेपे को वर्ल्ड हेरिटेज साइट के रूप में मान्यता दी और इसे प्रोटेक्टेड घोषित किया।

इतिहास के पन्नों में दर्ज प्राचीन सच

आज तुर्की की उस शांत पहाड़ी की चोटी पर खड़े हों, तो जमीन के अंदर चूना पत्थर के विशाल खंभे एक ऐतिहासिक गवाह के रूप में हमें देखते नजर आते हैं। मेगालिथ पत्थरों पर बिच्छू और गिद्धों की आकृतियां बहुत संभालकर उकेरी गई हैं। उनकी यह खामोश मौजूदगी एक बात याद दिलाती है। आज से 12 हजार साल पहले प्राचीन इंसानों की आत्मा में किसी अदृश्य सुप्रीम पावर के प्रति आस्था की पहली लौ जली थी।

टेक्नोलॉजी के चरम पर खड़ी आज की मॉडर्न मानव सभ्यता आज भी अपने अस्तित्व के सबसे पुराने सवालों के जवाब तलाश रही है। लेकिन गोबेकली तेपे के ये खामोश पत्थर एक सवाल हमेशा के लिए छोड़ गए। हमारी सभ्यता की शुरुआत क्या किसी किसान के हल के बल से या खेतों से हुई थी, या फिर इसकी असली शुरुआत इंसानी दिल में बसे विश्वास की गहराइयों से हुई होगी?