?The Real Truth of Tea: How the British built their Tea Empire by stealing 20,000 plants from China
दिन की शुरुआत हो या थकान भरी शाम, कांच के कप से उठती भाप वाली एक कप चाय हममें से कई लोगों के लिए सुकून और ताज़गी की बात होती है। लेकिन जिस चाय को आज दुनिया एक अच्छे लाइफस्टाइल का हिस्सा मानती है, उसका पुराना इतिहास क्या सचमुच इतना ही शांत है? इतिहास के पन्ने और पुराने दस्तावेज़ इसके पीछे की एक बेहद क्रूर और चौंकाने वाली कहानी बताते हैं।
अलग-अलग रिसर्च के मुताबिक, आज दुनिया भर में चाय का मार्केट लगभग 80 से 100 अरब डॉलर का हो चुका है। लेकिन चाय का यह बड़ा बिजनेस रातों-रात खड़ा नहीं हुआ। इस ड्रिंक को दुनिया भर में फैलाने के पीछे बड़ी-बड़ी साजिशें, इंटरनेशनल क्राइम, पेड़-पौधों की चोरी और दो बड़े खूनी युद्ध छिपे हैं। तो फिर सवाल उठता है कि दुनिया को अपना दीवाना बनाने वाली इस चाय का जन्म आखिर कहाँ हुआ था?
प्राचीन चीन: पुराने सबूतों और इतिहास के पन्नों में चाय की असली शुरुआत
चाय अंग्रेजों की खोज है, यह फैला हुआ झूठ हिस्टोरिक और आर्कियोलॉजिकल सबूतों के सामने टिक नहीं पाता। पुरानी कहानियों के मुताबिक, 2737 ईसा पूर्व में चीन के राजा शेन नुंग एक पेड़ के नीचे पानी उबाल रहे थे। तभी हवा की वजह से कुछ पत्तियां उड़कर पानी में आ गिरीं। उस पानी को पीकर उन्हें बहुत अच्छा लगा और वहीं से चाय की शुरुआत मानी गई। हालांकि, इस कहानी से हटकर असली वैज्ञानिक सबूतों के लिए हमें 2016 की एक खोज को देखना होगा।
अंतरराष्ट्रीय साइंस मैगज़ीन नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में 2016 में एक रिसर्च पेपर छपा था। इसके मुताबिक, चीन के शी-आन इलाके में राजा जिंग-दी की कब्र से दुनिया की सबसे पुरानी चाय की पत्तियों के टुकड़े मिले। जांच से साबित हुआ कि चाय की ये पत्तियां 141 ईसा पूर्व की हैं, यानी लगभग 2,150 साल पुरानी।
लिखे हुए सबूतों की बात करें तो अंग्रेजों के आने से सदियों पहले चीन में चाय पीने के पक्के रिकॉर्ड मिलते हैं। 59 ईसा पूर्व में चीनी कवि वांग-बाओ ने एक नौकर खरीदने का एग्रीमेंट पेपर लिखा था, जिसका नाम तोंग-युए था। उसमें साफ लिखा था कि उस नौकर का काम बाज़ार से चाय खरीदकर लाना और मेहमानों के लिए उसे उबालकर सर्व करना होगा।
इसके बाद 760 ईस्वी में चीनी विद्वान लू यू ने चा-जिंग नाम की एक किताब लिखी। यह चाय पर लिखी गई दुनिया की पहली पूरी किताब थी, जिसमें चाय की खेती करने, पत्तियां चुनने और चाय बनाने के तरीकों के बारे में विस्तार से बताया गया था। यानी जब अंग्रेजों को चाय का नाम तक नहीं पता था, उससे भी हज़ारों साल पहले चीन इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा बना चुका था। लेकिन चीन की यह शांत परंपरा यूरोपीय व्यापारियों के हाथों में आकर खूनी बिजनेस में कैसे बदल गई?
अफीम युद्ध: चाय की कीमत खून से चुकाई गई
ब्रिटेन में चाय पहुँचने का पहला लिखा हुआ सबूत 25 सितंबर 1660 को सैमुअल पीप्स की डायरी में मिलता है। उन्होंने लिखा था कि उन्होंने एक चीनी ड्रिंक ऑर्डर किया है, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं पिया था। ब्रिटेन पहुँचते ही चाय रातों-रात वहाँ के अमीर लोगों की पहली पसंद बन गई। लेकिन असली परेशानी लेन-देन में शुरू हुई।
चीन के राजाओं का नियम था कि चाय के बदले वे सिर्फ शुद्ध चांदी ही लेंगे। ब्रिटेन में चाय की डिमांड इतनी ज्यादा थी कि ब्रिटेन के खजाने से भारी मात्रा में चांदी निकलकर चीन जाने लगी। नतीजा यह हुआ कि ब्रिटेन की इकोनॉमी पर गहरा संकट मंडराने लगा।
इस आर्थिक नुकसान से निकलने के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक बहुत ही गंदा रास्ता चुना। उन्होंने भारत खासकर बंगाल और बिहार में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती शुरू करवाई और उस अफीम की चीन में चोरी-छिपे सप्लाई करने लगे। देखते ही देखते चीन के लाखों लोग अफीम के आदी बन गए। चीन का खजाना वापस अंग्रेजों के पास लौटने लगा और अंग्रेज उसी चांदी से दोबारा चाय खरीदने लगे।
जब चीन की सरकार ने अपने लोगों को बचाने के लिए इस अवैध अफीम को जब्त करके नष्ट करना शुरू किया, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने चाय के बिजनेस को बचाने के लिए चीन पर हमला कर दिया। इतिहास में इसे पहला और दूसरा अफीम युद्ध (1839–1860) कहा जाता है। सिर्फ चाय के बिजनेस पर कब्जा बनाए रखने के लिए एक पूरे देश को तबाह कर दिया गया और लाखों निर्दोष लोगों की जान ले ली गई।
युद्ध जीतने के बाद भी चीन पर निर्भर रहना अंग्रेजों के लिए रिस्की लग रहा था। वे चाय के बाज़ार पर अपना मोनोपोली चाहते थे। इसी सोच के साथ इतिहास की सबसे बड़ी पौधों की चोरी का प्लान बनाया गया।
चाय की जासूसी: रॉबर्ट फॉर्च्यून का सीक्रेट मिशन
चीन के लोगों ने चाय के पौधों, बीजों और चाय बनाने के तरीके को बहुत छिपाकर रखा था। ईस्ट इंडिया कंपनी जानती थी कि चीनियों से यह तरीका सीधे मांगकर हासिल करना नामुमकिन है। इस मुश्किल को हल करने के लिए 1848 में कंपनी ने स्कॉटिश बोटैनिस्ट रॉबर्ट फॉर्च्यून को चुना। फॉर्च्यून ने चीन के अमीर लोगों जैसा भेष बदला, चीनी कपड़े पहने, सिर मुंडवाकर लंबी चोटी लगाई। इसी सीक्रेट लुक में वे चीन के उन इलाकों में घुस गए जहाँ विदेशियों का जाना सख्त मना था। यह इतिहास की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट चोरी थी।
फॉर्च्यून ने अपनी जान जोखिम में डालकर चीन के सुरक्षित बागानों से लगभग 20,000 चाय के पौधे और बीज चुरा लिए। यही नहीं, वे अपने साथ कुछ अनुभवी चीनी चाय-मज़दूरों को भी चुपचाप भारत ले आए। चीन की हज़ारों साल पुरानी कला को अंग्रेज धोखे से अपने कब्जे वाले इलाके में ले आए।
चीन से पौधे और चाय बनाने का तरीका चुराने के बाद अंग्रेजों को एक बड़ी जमीन की तलाश थी जहाँ चाय के बागान लगाए जा सकें। उनकी नज़र भारत पर पड़ी। हालांकि, भारत चाय के लिए कोई अनजान जगह नहीं थी, लेकिन यह बात अंग्रेजों को मालूम नहीं थी।
भारत में चाय की शुरुआत: जंगली चाय की खोज, वर्ल्ड क्लास पहचान और मजदूरों का शोषण
अंग्रेज हमेशा यह दावा करते रहे कि भारत में चाय वे लाए थे। लेकिन इतिहास के दस्तावेज़ इस दावे को गलत साबित करते हैं। अंग्रेजों की इस चोरी से बहुत पहले असम की ब्रह्मपुत्र घाटी के सिंगफो और खामती आदिवासी समुदाय चाय का इस्तेमाल करते थे। वे जंगल की पत्तियों को उबालकर पीते थे, जिसे वे फालप कहते थे।
1823 में स्कॉटिश यात्री रॉबर्ट ब्रूस ने असम के मणीराम दीवान और सिंगफो राजा बीसा गाम की मदद से इन जंगली चाय के पौधों को खोजा। इसे 1839 में सी. ए. ब्रूस की रिपोर्ट और 1834 में गवर्नर जनरल बैंटिंक की टी कमेटी की रिपोर्ट में सरकारी तौर पर दर्ज किया गया।
चीन से चुराए गए तरीके और असम की इस देसी चाय की किस्म ने मिलकर भारत में चाय इंडस्ट्री की नींव रखी। आगे चलकर भारत की दार्जिलिंग चाय, जिसे अपनी बढ़िया खुशबू के कारण चाय की शैंपेन कहा जाता है, उसे और असम की कड़क चाय ने दुनिया भर में नाम कमाया।
लेकिन भारत में इस चाय इंडस्ट्री को खड़ा करने में मजदूरों पर भारी अत्याचार हुआ। कुली प्रथा के तहत लाखों गरीब आदिवासियों को मध्य भारत और छोटानागपुर से झूठे वादे करके लाया गया और असम-दार्जिलिंग के जंगलों में गुलाम बना दिया गया। मारपीट और भुखमरी के बीच भारतीय मजदूरों के खून-पसीने से ब्रिटिश चाय साम्राज्य को सींचा गया। अंग्रेजों का यह लालच सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं रहा। चाय पर लगने वाले टैक्स और कब्जे की कीमत समुद्र पार अमेरिका को भी चुकानी पड़ी।
बोस्टन टी पार्टी: वर्ल्ड पॉलिटिक्स और क्रांति का कारण बनी चाय
चाय ने केवल एशिया या यूरोप के बिजनेस को ही नहीं बदला, बल्कि अमेरिका के इतिहास को भी नया मोड़ दिया। 1773 में ब्रिटिश सरकार ने टी एक्ट पास किया, जिसके तहत अमेरिकी इलाकों में ईस्ट इंडिया कंपनी को बिना टैक्स के चाय बेचने का पूरा हक दे दिया गया। अमेरिका के लोगों ने अंग्रेजों के इस अन्यायपूर्ण फैसले का जमकर विरोध किया। 16 दिसंबर 1773 की रात संस ऑफ लिबर्टी नाम के एक ग्रुप ने भेष बदलकर बोस्टन पोर्ट पर खड़े ब्रिटिश जहाजों पर हमला बोल दिया और वहां मौजूद चाय की 342 पेटियों को समुद्र में फेंक दिया।
इतिहास में यह घटना बोस्टन टी पार्टी के नाम से जानी गई। समुद्र के पानी में फेंकी गई वही चाय की पेटियां अमेरिकी क्रांति की वजह बनीं, जिससे आगे चलकर एक नए देश अमेरिका का जन्म हुआ।
एक साधारण पेड़ की पत्ती ने एशियन समाज को उजाड़ा, भारत के लोगों को गुलाम बनाया और अमेरिका में क्रांति की आग लगाई। यह पूरा इतिहास हैरान कर देने वाला है। इतिहास के दस्तावेज़ और पुराने सबूत साफ करते हैं कि चाय किसी भी तरह अंग्रेजों की खोज नहीं है। चाय प्राचीन चीन की एक अद्भुत देन थी, जो भारत में भी कुदरती रूप से मौजूद थी।
ब्रिटिश सरकार ने केवल धोखे, चोरी और ताकत के दम पर इसे अपना ब्रांड बनाया था। आज हम जो 80-100 अरब डॉलर की चाय इंडस्ट्री देखते हैं, उसकी हर चुस्की में अफीम युद्ध का दर्द, शोषित भारतीय मजदूरों का पसीना और दुनिया की राजनीति को बदलने वाला खूनी सच मौजूद है।
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