?How Ancient Greeks Built a 2,000-Year-Old Astronomical Computer

साल 1900 की बात है। ग्रीस में एंटीकिथेरा नाम का एक छोटा और सुनसान द्वीप । एक दिन वहां तेज तूफान आया और प्राकृतिक स्पंज इकट्ठा करने वाले गोताखोरों की नाव उसमें फंस गई। जब तूफान थमा, तो समुद्र का हाल देखने के लिए गोताखोर एलायस तादियातोस लगभग 45 मीटर गहरे पानी में उतरे। यहां बता दे तब आज की तरहा कृत्रिम स्पंज नहीं थे, तो बे प्राकृतिक स्पंज इकट्ठा करके इस्तेमाल करते थे।

नीचे पहुंचने के बाद उन्हें समुद्र की रेत पर एक बहुत पुराना रोमन जहाज डूबा हुआ मिला। पानी के ऊपर आकर उन्होंने तुरंत कैप्टन दिमित्रियोस कोन्तोस को यह बात बताई। शहर लौटने के बाद कैप्टन ने एथेंस जाकर ग्रीक सरकार और नेवी को इसकी जानकारी दी।

खबर मिलते ही ग्रीक नेवी के युद्धपोत माइकाले की मदद से 1900-1901 में एक बड़ा खोज अभियान चलाया गया। उस जमाने के भारी कपड़े और पीतल के भारी हेलमेट पहनकर इतनी गहराई में जाना गोताखोरों के लिए बहुत जोखिम भरा काम था।

फिर भी, इस खोज में समुद्र के नीचे से संगमरमर और ब्रॉन्ज की सुंदर मूर्तियां, सोने-चांदी के सिक्के और मिट्टी के बर्तन निकाले गए। इन सब कीमती चीजों के साथ हरे रंग का जंग लगा एक धातु का अजीब सा टुकड़ा भी एथेंस के नेशनल आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम भेजा गया। लेकिन बाकी सुंदर मूर्तियों के बीच इस पर शुरुआत में किसी का खास ध्यान नहीं गया।

म्यूजियम की धूल से अदभुत खोज (1901 - 2005)

म्यूजियम पहुंचने के बाद करीब नौ महीनों तक वह जंग लगा धातु का टुकड़ा एक बक्से में बंद पड़ा रहा। 17 मई 1902 को ग्रीक पुरातत्वविद वैलेरियोस स्ताइस जब स्टोररूम की चीजें देख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि लकड़ी का बक्सा सूखकर टूट चुका था। बक्से के अंदर रखे धातु के टुकड़े की दरार से बारीक दांतों वाले छोटे छोटे पहिए साफ दिख रहे थे।

इतिहास को हैरान कर देने वाली इस चीज पर पहली बार किसी की नजर पड़ी थी। पर उस दौर के इतिहासकारों को इस पर यकीन ही नहीं हुआ। उनका मानना था कि ईसा पूर्व पहली सदी में ऐसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी बनाना बिल्कुल नामुमकिन था।

इसी वजह से अगले 40 सालों तक वह चीज म्यूजियम के कोने में चुपचाप पड़ी रही। पहली बार 1951 में ब्रिटिश वैज्ञानिक डेरेक डी सोला प्राइस ने म्यूजियम पहुंचकर इस पर नए सिरे से स्टडी शुरू की। 1959 में उन्होंने पहली बार बताया कि यह प्राचीन ग्रीक लोगों का बनाया एक अनोखा कंप्यूटर है। लेकिन उस समय सही टेक्नोलॉजी न होने की वजह से, बिना तोड़े इसके अंदर झांकना मुमकिन नहीं था।

काफी समय बाद, 1971 में परमाणु वैज्ञानिकों की मदद से पहली बार एक्स-रे और गामा-रे का इस्तेमाल किया गया। इससे बिना नुकसान पहुंचाए अंदर छिपे 30 पहियों की गिनती हो सकी और 1974 में प्राइस ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट पब्लिश की।

आगे चलकर 1976 में फ्रांसीसी समुद्र विज्ञानी जैक कुस्तो ने वहां दोबारा डाइविंग करके कुछ पुराने सिक्के ढूंढे, जिससे साफ हुआ कि यह जहाज ईसा पूर्व 60 से 70 के आसपास डूबा था। फिर नब्बे के दशक में लंदन के साइंस म्यूजियम के क्यूरेटर माइकल राइट ने एडवांस्ड एक्स-रे टोमोग्राफी से इस मैकेनिज्म का एक 3D डिजाइन तैयार किया।

इसके बाद 2000 के दशक की शुरुआत में 3D एक्स-रे माइक्रो-टोमोग्राफी तकनीक आई। इस बरसों पुरानी गुत्थी को सुलझाने के लिए 2005 में दुनिया भर के वैज्ञानिकों की एक खास टीम बनी, जिसे एंटीकिथेरा मैकेनिज्म रिसर्च प्रोजेक्ट कहा गया। प्रोफेसर माइक एडमंड्स और टोनी फ्रिथ की देखरेख में 3D स्कैनर के जरिए इस डिवाइस की पूरी अंदरूनी बनावट और उस पर लिखे करीब 3,500 बारीक अक्षरों की बातें साफ हो गईं।

क्या है यह 2000 साल पुराना मैकेनिज्म?

तकनीकी जांच से पता चला कि यह मैकेनिज्म एक छोटे दरवाजे वाले लकड़ी के बॉक्स में बंद था। इसके बाहर एक हैंडल लगा हुआ था। इस हैंडल को घुमाने पर अंदर मौजूद अलग-अलग साइज के कम से कम 30 ब्रॉन्ज के गियर वाले पहिए एक साथ घूमने लगते थे। इसके बाहरी डायल पर लगी सुइयां घूमकर किसी भी चुनी हुई तारीख के खगोलीय कैलेंडर और ग्रहों-नक्षत्रों की सटीक जगह बता देती थीं। वैज्ञानिकों को दो खास वजहों से पूरा यकीन हो गया कि इसे ग्रहों की चाल नापने और सूर्य-चंद्र ग्रहण का सही समय पता लगाने के लिए ही बनाया गया था।

पहला, पहियों के दांतों की संख्या प्राचीन एस्ट्रोनौमी के हिसाब से बिल्कुल सटीक बैठती है। जैसे 235 दांतों वाला पहिया 19 सौर सालों के मेटोनिक कैलेंडर को दिखाता था और 223 दांतों वाला पहिया 18 सालों के सारोस ग्रहण चक्र को दिखाता था।

दूसरा, इस मशीन की धातु पर लिखे करीब 3,500 ग्रीक अक्षरों को पढ़ा गया। इनमें सूर्य, चंद्रमा और उस समय के पांच ग्रहों जैसे बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि की चाल दर्ज थी। साथ ही चंद्रमा के घटने-बढ़ने और ग्रहण के समय, आसमान के रंग व दिशा की पूरी जानकारी दी गई थी। यह एक तरह से मशीन के ऊपर ही लिखा हुआ उसका यूजर मैनुअल था। इसके अलावा एक और छोटा डायल ओलंपिक खेलों समेत हर चार साल पर होने वाले पुराने खेल आयोजनों का शेड्यूल भी बता देता था।

हेलेनिस्टिक ग्रीस और ऐतिहासिक प्रमाणों की सच्चाई

इस खोज से पता चलता है कि प्राचीन ग्रीक लोगों का गणितीय ज्ञान सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं था। वे अपने इस ज्ञान को धातु की मशीनों में ढालना भी अच्छी तरह जानते थे। उदाहरण के लिए, आसमान में चंद्रमा की गति एकदम गोल चक्कर में नहीं होती, बल्कि थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी और असमान होती है। चंद्रमा की इस चाल को नापने के लिए मशीन में पिन-एंड-स्लॉट पहियों की तकनीक लगाई गई थी, जो प्राचीन ग्रीक खगोलशास्त्री हिप्पार्कस के सिद्धांत पर आधारित थी।

पुराने दौर की किताबों और दस्तावेजों में भी ऐसी मशीनों का जिक्र मिलता है। प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक सिसरो ने ईसा पूर्व पहली सदी में अपनी किताब दे रे पब्लिका में लिखा था कि महान वैज्ञानिक आर्किमिडीज ने पीतल का एक ऐसा यंत्र बनाया था जो सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की चाल दिखाता था। ईसा पूर्व 212 में जब सिरैक्यूज पर हमला हुआ, तब रोमन सेनापति मार्सेलस उस यंत्र को अपने साथ रोम ले गए थे।

सिसरो ने यह भी लिखा कि उनके समय में रोड्स द्वीप पर दार्शनिक पोसिडोनियस की वर्कशॉप में भी ऐसी गियर वाली मशीनें बनाई जाती थीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एंटीकिथेरा मैकेनिज्म ईसा पूर्व 150 से 100 के बीच रोड्स द्वीप की ही किसी वर्कशॉप में बना था और रोम ले जाते समय जहाज डूबने से समुद्र में समा गया।

खोई हुई सदियां और आधुनिक कंप्यूटिंग का मेल

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इतने बारीक गियर पहियों की यह तकनीक इतिहास से अचानक कहां गायब हो गई? असल में रोमन साम्राज्य के पतन और मध्यकालीन यूरोप की उथल-पुथल में यह इंजीनियरिंग का ज्ञान पूरी तरह मिट गया। 14वीं सदी में जब यूरोप में मैकेनिकल घड़ियां बननी शुरू हुईं, उससे पहले 1500 सालों तक ऐसी उन्नत मशीन दोबारा कहीं नहीं देखी गई।

बाद में इस मशीन को दुनिया का पहला एनालॉग कंप्यूटर मानने की बात पर दुनिया भर में सहमति बनी। 1959 में वैज्ञानिक डेरेक डी सोला प्राइस ने पहली बार इसे प्राचीन कंप्यूटर कहा था। 2006 में जब मशहूर साइंस जर्नल Nature में AMRP की रिसर्च छपी, तो पूरी वैज्ञानिक दुनिया ने इस पर मुहर लगा दी। फिर अंतरराष्ट्रीय संस्था IEEE और यूनेस्को ने एंटीकिथेरा मैकेनिज्म को दुनिया के सबसे पुराने एनालॉग कंप्यूटर के रूप में मान्यता दी और इसे प्रतिष्ठित IEEE Milestone सम्मान दिया। फिलहाल यह मशीन ग्रीस के नेशनल आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम में रखी हुई है।

बिना किसी बिजली या चिप के, सिर्फ गियर वाले पहियों के दम पर खगोलीय गणनाएं कर लेने वाली यह तकनीक बताती है कि आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी से सैकड़ों साल पहले भी इंसान साइंस और इंजीनियरिंग में कितना आगे निकल चुका था।