From Bleeding Europe to the Port of Heaven: The Struggle of Homeless Jews and a Brave Japanese Diplomat

सितंबर 1940 का वह दिन मैं जीवन भर नहीं भूल सकता। कौनास स्टेशन उस समय आंसुओं, चीख-पुकार और डर का एक नरक बना हुआ था। सुगिहारा की ट्रेन छूटने में बस कुछ ही मिनट बाकी थे। वह ट्रेन के डिब्बे की खिड़की खोलकर नीचे झुके हुए थे। उनके हाथ कांप रहे थे। इसके बावजूद वह एक के बाद एक पासपोर्ट पर दस्तखत कर रहे थे और मुहर लगा रहे थे।

प्लेटफॉर्म पर हजारों लोग ट्रेन की खिड़की की तरफ हाथ बढ़ाकर चिल्ला रहे थे–'हमें एक कागज दे दीजिए! एक दस्तखत हमें बचा लेगा!' सुगिहारा खिड़की से जितने हो सके, दस्तखत किए हुए कागज फेंक रहे थे। जब ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी, तो वह और दस्तखत नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने खिड़की के बाहर दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका लिया और फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी रुंधी हुई आवाज में आखिरी शब्द थे–'मुझे माफ कर दीजिए... मैं और नहीं कर पाया... आप सभी को बचाने की ताकत मुझमें नहीं थी।”

यह कहानी सिर्फ किसी एक इंसान की नहीं है। यह हिटलर के नाज़ी जर्मनी के कंसंट्रेशन कैंप जाने के डर से देश छोड़कर भागते हजारों बेबस यहूदियों के जीवन-संघर्ष की दर्दनाक दास्तान है। आगे चलकर यह कहानी विश्व इतिहास का एक अनोखा मानवीय दस्तावेज बन गई।

दरअसल उस दिन ऐसा क्या हुआ था? वह घटना आज इतिहास और इंसान के मन में क्यों दर्ज हो गई? आइए जानते हैं।

यूरोप की आग और अंतरराष्ट्रीय कानून का एक अदभुत लूपहोल

मई 1940 में नाज़ी जर्मनी ने नीदरलैंड्स पर कब्जा कर लिया। इसके बाद डच रानी और उनकी सरकार भागकर लंदन चली गई। वहां उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया। उस उथल-पुथल भरे समय में डच व्यापारी यान ज़्वारटेनडिक लिथुआनिया के कौनास शहर में कार्यरत थे। डच सरकार ने उन्हें लिथुआनिया में नीदरलैंड्स का कार्यवाहक कौंसुल नियुक्त कर दिया।

पोलैंड से भागकर आए हजारों यहूदी शरणार्थी उस समय लिथुआनिया में फंसे हुए थे। यूरोप के बाकी सभी रास्ते बंद थे। इसलिए जिंदा बचने के लिए शरणार्थियों को यूरोप के बाहर जाने का आधिकारिक प्रमाण चाहिए था। डच कौंसुल ज़्वारटेनडिक और लातविया में तैनात डच राजदूत अल्फ्रेड दे डेकेन ने मिलकर इंसानों को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का एक अद्भुत लूपहोल ढूंढ निकाला।

कैरिबियाई सागर में स्थित डच उपनिवेश कुराकाओ (Curacao) उस समय भी नाज़ियों के नियंत्रण से मुक्त था। ज़्वारटेनडिक ने हिम्मत दिखाकर कानूनी शर्त को चालाकी से छुपाया। उन्होंने शरणार्थियों के पासपोर्ट पर मुहर लगाकर लिखना शुरू कर दिया: "कुराकाओ और अन्य डच उपनिवेशों में प्रवेश के लिए किसी वीजा की आवश्यकता नहीं है।"

नतीजतन कागजों पर ऐसा लगने लगा कि इन बेघर शरणार्थियों के पास दुनिया के एक कोने में एक 'पक्की मंजिल' मौजूद है। यहीं से ऐतिहासिक कुराकाओ परमिट का जन्म हुआ।

सोवियत सीमा और ट्रेन की कठिन शर्त

इसी दौरान सोवियत संघ ने लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया। उसने विदेशियों के लिए बने सभी दूतावासों को तुरंत बंद करने का आदेश दे दिया। पोलिश शरणार्थियों को अगर सोवियत इलाके से गुजरने नहीं दिया जाता, तो वे नाज़ियों के हत्थे चढ़कर मारे जाते–यह खौफनाक सच्चाई सबको मालूम थी।

सोवियत पुलिस प्रशासन (NKVD) ने डच कौंसुल का वह कागज देखा। उन्होंने बताया कि सिर्फ मंजिल का कागज (कुराकाओ परमिट) होने से काम नहीं चलेगा। सोवियत संघ की प्रसिद्ध मेंट्रांस-साइबेरियन रेलवे का इस्तेमाल करके एशिया पहुंचने के लिए रास्ते के कम से कम एक देश का वैध ट्रांजिट वीजा होना जरूरी है।

भौगोलिक नक्शे के हिसाब से, जापान का कोबे बंदरगाह पार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। नतीजतन सोवियत सीमा पार करके ट्रेन में चढ़ने की चाबी जापान के एक अस्थायी यात्रा परमिट पर आकर अटक गई।

जापान का ट्रांजिट वीजा और सुगिहारा से ऐतिहासिक जुड़ाव

ठीक इस भीषण संकट के वक्त हजारों शरणार्थी ज़्वारटेनडिक की बनाई कानूनी तरकीब के सहारे कौनास में जापान के उप-कौंसुल चिउने सुगिहारा के दरवाजे पर जा पहुंचे। उन्होंने दिखाया कि उनके पास कुराकाओ परमिट है। इसलिए रास्ते में जापान के बंदरगाह के इस्तेमाल के लिए उन्हें सिर्फ एक ट्रांजिट वीजा चाहिए।

सुगिहारा एक चतुर राजनयिक थे। वह तुरंत समझ गए कि यह पूरी तरह से कानूनी समझदारी का खेल है। हकीकत में उस सुदूर द्वीप तक पहुंचना लगभग नामुमकिन था, लेकिन कागजों में यह एक वैध मंजिल का सबूत बन चुका था। टोक्यो सरकार की सीधी मनाही थी। इसके बावजूद सुगिहारा ने इस कानूनी लूपहोल को हथियार बनाया और शरणार्थियों को दिल खोलकर जापानी ट्रांजिट वीजा देना शुरू कर दिया।

टोक्यो का हुक्म बनाम ज़मीर की आवाज़

जापानी दूतावास के बाहर भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। सैकड़ों लोगों के दर्दभरे चेहरों को देखकर चिउने सुगिहारा चुप नहीं रह सके। उन्होंने एक के बाद एक तीन बार टोक्यो के विदेश मंत्रालय (गाइमुशो) को आपातकालीन टेलीग्राम भेजे। उन्होंने सभी नियम ढीले करके इन मुसीबतज़दा लोगों को ट्रांजिट वीजा देने की विशेष अनुमति मांगी।

लेकिन टोक्यो से हर बार सख्त जवाब आया: "किसी भी हाल में अनुमति देना संभव नहीं है। जरूरी पैसों और पक्की मंजिल के वैध वीजा के बिना किसी को भी ट्रांजिट वीजा न दिया जाए।"

विदेश मंत्री के आदेश की अनदेखी करने का मतलब था अपना अंतरराष्ट्रीय राजनयिक करियर हमेशा के लिए बर्बाद करना। यहां तक कि उन्हें सजा भी भुगतनी पड़ सकती थी। सुगिहारा ने अपनी पत्नी के साथ लंबी बातचीत की। 29 जुलाई 1940 की सुबह वह एक ऐतिहासिक फैसले पर पहुंचे। उनके लिए राजनयिक शिष्टाचार या सरकारी आदेश से कहीं ज्यादा कीमत किसी इंसान की जान बचाने की थी।

अमानवीय मेहनत और 18 घंटे का महायज्ञ

उसी दिन से एक अनोखा बचाव अभियान शुरू हुआ। हर दिन सुबह से देर रात तक लगातार 18 से 20 घंटे मेज़ पर बैठकर सुगिहारा खुद अपने हाथों से वीजा लिखते रहे। दिन बीतने के साथ सुगिहारा की उंगलियां जमने लगी थीं। उनकी कलाई में भयानक दर्द होने लगा था। रात को उनकी पत्नी युकीको सुगिहारा गरम पानी और तेल से पति के बेजान हाथों की मालिश करतीं, ताकि अगली सुबह वह फिर कलम थाम सकें। युकीको खुद भी पास बैठकर कागजात संभालतीं और मुहर लगाने का काम करती थीं।

सुगिहारा ने न केवल सरकार का कानून नजरअंदाज किया, बल्कि नियम तोड़कर एक ट्रांजिट वीजा में पूरे परिवार को शामिल करना भी शुरू कर दिया। इस तरह 1 वीजा पर 5 से 6 लोगों का परिवार एक साथ बचने लगा। लगातार एक महीने की इस कड़ी मेहनत में उन्होंने अपने रजिस्टर में कुल 2,139 आधिकारिक वीजा दर्ज किए। इसकी बदौलत 6,000 से भी ज्यादा लोगों की जान निश्चित मौत से बच गई।

होटल के कमरे से स्टेशन तक: आखिरी लम्हों की गुहार

इधर सोवियत संघ ने लिथुआनिया पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था। इसके बाद 1 सितंबर 1940 को दूतावास आधिकारिक रूप से बंद करने का नोटिस जारी कर दिया गया। लेकिन सुगिहारा नहीं रुके। वह सामान समेटकर कौनास के मेट्रोपोलिस होटल में चले गए। वह होटल के कमरे से भी लगातार वीजा लिखते रहे।

आखिरकार 4 सितंबर को सोवियत दबाव के कारण उन्हें लिथुआनिया छोड़ना ही पड़ा। वह ट्रेन पकड़ने के लिए कौनास रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां भी उन्होंने देखा कि सैकड़ों शरणार्थी पासपोर्ट की उम्मीद में खड़े हैं। ट्रेन के डिब्बे की खिड़की पर बैठकर भी वह दस्तखत करते जा रहे थे।

जब सरकारी पैड खत्म हो गया, तो वह साधारण सफेद कागज के टुकड़ों का इस्तेमाल करने लगे। वह उन पर दूतावास की मुहर और अपने दस्तखत करके खिड़की से बाहर फेंकने लगे। ट्रेन छूटने के आखिरी पल तक वह हाथ बढ़ाकर वे कागज फेंकते रहे। वह रुंधी हुई आवाज में माफी मांग रहे थे। इस तरह उन्होंने निस्वार्थ भाव से कागज बांटकर इंसानियत की एक अनोखी मिसाल कायम की।

साइबेरिया जाने वाली ट्रेन में यहूदियों का सपनों का सफर

स्टेशन पर खड़े कई शरणार्थी उस एक टुकड़े मुहर लगे कागज और कुराकाओ परमिट को उठाकर सीधे सोवियत सीमा और पुलिस दफ्तर पहुंचे। डच कौंसुल ज़्वारटेनडिक की कानूनी समझदारी और सुगिहारा के हाथ के लिखे कागज की ताकत ने काम किया। सोवियत प्रशासन इन्हें वैध दस्तावेज मानने पर मजबूर हो गया।

नाज़ियों के हाथों मौत के मुंह से बचकर हजारों पोलिश-यहूदी शरणार्थी ट्रांस-साइबेरियन एक्सप्रेस के डिब्बों में सवार हो गए। उनकी जेब में सुगिहारा का हाथ से लिखा जापानी ट्रांजिट वीजा था। साइबेरिया पार करके एशिया की तरफ बढ़ने के साथ ही मानव इतिहास का एक बेहद भावुक और रोमांचक बचाव अध्याय शुरू हुआ।

साइबेरिया के बर्फ़ीले रास्तों पर लंबा सफ़र

कौनास स्टेशन से ट्रेन छूटने के बाद शरणार्थियों का एक लंबा और बेहद अनिश्चित सफर शुरू हुआ। मॉस्को पहुंचकर उन्हें मशहूर ट्रांस-साइबेरियन रेलवे में सवार होना पड़ा। यूरेशिया महाद्वीप के हजारों मील लंबे बर्फ़ीले साइबेरिया क्षेत्र को पार करना आसान नहीं था।

सोवियत गुप्त पुलिस की सख्त निगरानी और तलाशी जारी थी। फिर भी, पासपोर्ट पर सुगिहारा का हाथ से लिखा जापानी ट्रांजिट वीजा होने के कारण किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया। लगभग एक हफ्ते तक बर्फ़ीला साइबेरिया पार करने के बाद ट्रेन आखिरकार व्लादिवोस्तोक में जाकर रुकी। प्रशांत महासागर के तट पर स्थित यह सोवियत संघ का पूर्वी बंदरगाह शहर था।

जापान सागर पार करना और सुरुगा बंदरगाह पहुंचना

व्लादिवोस्तोक बंदरगाह पहुंचने के बाद शरणार्थियों को जापानी स्टीमर जहाजों पर सवार होना पड़ा। उफनते जापान सागर को पार करके 1940 के अंत और 1941 की शुरुआत में वे जहाज एक-एक करके जापान के फुकुई प्रांत के सुरुगा (Tsuruga) बंदरगाह पहुंचे।

जहाज से उतरते ही यूरोपीय शरणार्थियों की हालत दयनीय थी। वे फटे-पुराने कपड़ों में थे, भूखे थे और लंबे सफर से थके-हारे थे। उन्हें देखकर सुरुगा शहर के आम जापानी नागरिक हैरान रह गए, लेकिन उन्होंने गहरी हमदर्दी दिखाई। स्थानीय जापानियों ने अपने बाथहाउस खोल दिए, बच्चों को फल दिए और बड़ी आत्मीयता से उनके साथ खड़े हुए। कई शरणार्थियों के लिए यह बंदरगाह स्वर्ग का बंदरगाह बन गया।

कोबे शहर में पनाह और जापानियों की मेहमाननवाज़ी

सुरुगा बंदरगाह से शरणार्थियों को ट्रेन के ज़रिए जापान के ऐतिहासिक बंदरगाह शहर कोबे (Kobe) ले जाया गया। वहां स्थानीय यहूदी राहत समिति और कोबे शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलकर इन हजारों लोगों के रहने का इंतज़ाम किया।

नियम के मुताबिक सुगिहारा के दिए ट्रांजिट वीजा की मियाद सिर्फ 7 से 15 दिन की थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति और स्थानीय जापानी अधिकारियों के सहयोग से वीजा की मियाद को कई महीनों तक बार-बार बढ़ाना मुमकिन हो सका। कोबे में बिताए वे कुछ महीने शरणार्थियों के लिए युद्ध की विभीषिका के बीच शांति का एक अजीब दौर थे।

प्रशांत युद्ध और शंघाई घेटो में आखिरी पड़ाव

जिन लोगों के पास दूसरे देशों के वैध वीजा थे, वे अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में चले गए। लेकिन 1941 के मध्य में प्रशांत महासागर युद्ध के बादल गहराने लगे। उस समय जिनके पास कोई वीजा नहीं बचा था, ऐसे लगभग 2,500 यहूदी शरणार्थी थे। जापानी सरकार ने उन्हें चीन में जापानी सेना के नियंत्रण वाले शंघाई घेटो में ट्रांसफर कर दिया।

नाज़ी जर्मनी की तरफ से दबाव बनाए जाने के बावजूद जापानी सैन्य प्रशासन ने यहूदियों को सौंपने की मांग ठुकरा दी। नतीजतन सुगिहारा के एक टुकड़े कागज के भरोसे यूरोप से भागकर आया हर शरणार्थी 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने तक शंघाई घेटो में पूरी तरह सुरक्षित रहा। युद्ध खत्म होने के बाद वे दुनिया के अलग-अलग कोनों में फैल गए और इतिहास में सुगिहारा सर्वाइवर्स के नाम से जाने गए।

उस जापानी राजनयिक की स्वदेश वापसी और चरम उपेक्षा

इस बीच विश्व युद्ध के अंतिम चरण में सुगिहारा रोमानिया में तैनात थे। वहां सोवियत लाल सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद सुगिहारा को अपने परिवार के साथ लगभग डेढ़ साल युद्धबंदी शिविर में बिताने पड़े। 1947 में रिहा होकर वह अपने देश जापान पहुंचे।

लेकिन अपनी मातृभूमि में उन्हें कोई सम्मान नहीं मिला। कौनास में टोक्यो का आदेश न मानकर हजारों यहूदियों को वीजा देना उनके लिए जुर्म बन गया। जापानी विदेश मंत्रालय ने उन्हें तलब किया। इसे नाकाबिल-ए-माफी अपराध बताकर उन्हें बेइज्जत किया गया और नौकरी से निकाल दिया गया।

संघर्षपूर्ण आखिरी जीवन

नौकरी गंवाने के बाद सुगिहारा अपने परिवार के साथ घोर गरीबी और आर्थिक तंगी में घिर गए। गुजर-बसर के लिए उन्होंने टोक्यो में कई काम किए। वह घर-घर जाकर बल्ब बेचते थे। उन्होंने रूसी भाषा के अनुवादक और एक छोटी सी व्यापारिक कंपनी में क्लर्क के रूप में भी काम किया।

अपने इतने बड़े त्याग और मानवीय काम की भनक सुगिहारा ने किसी को लगने नहीं दी। घोर गरीबी के बावजूद वह टोक्यो के एक कोने में साधारण इंसान बनकर गुमनामी में जीते रहे। आखिरकार 1968 में उनके वीजा से बचे हुए यहूदी लोगों ने ढूँढ-ढूँढकर उन्हें खोज निकाला।

उनके दिए वीजा से जिंदा बचे हजारों लोग उन्हें कभी नहीं भूले। 1968 में इजराइली दूतावास के राजनयिक यहोशुआ निशरी ने उन्हें खोज निकाला। निशरी खुद भी बचपन में सुगिहारा के वीजा की बदौलत ही बचे थे। उन्होंने कड़ी मशक्कत के बाद सुगिहारा को ढूँढा, जो टोक्यो की एक साधारण ट्रेडिंग कंपनी में काम कर रहे थे।

इजराइल का सर्वोच्च सम्मान और आर्थिक मदद

सुगिहारा का पता चलने के बाद 1969 में इजराइल सरकार ने उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में इजराइल बुलाया और अभूतपूर्व स्वागत किया। 1985 में इजराइल के राष्ट्रीय नरसंहार स्मारक 'याद वाशेम' ने उन्हें गैर-यहूदियों के लिए इजराइल के सर्वोच्च नागरिक सम्मान राइटियस अमंग द नेशंस (Righteous Among the Nations) से सम्मानित किया।

इसके अलावा इजराइल सरकार ने सुगिहारा के बच्चों की इजराइली विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए पूरी स्कॉलरशिप दी और यरूशलेम सहित कई जगहों पर उनके नाम के स्मारक बनवाए।

जापान की ओर से देर से मिली मान्यता

जिंदगी भर उन्हें अपने देश में कोई पहचान नहीं मिली। आखिरकार 1986 में 86 साल की उम्र में सुगिहारा का निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार में दुनिया भर से आए तमाम यहूदी प्रतिनिधि और विदेशी राजनयिक मौजूद थे। उन्हें देखकर जापानी मीडिया और जनता को पहली बार इस खामोश नायक के महान कारनामे का पता चला।

आखिरकार साल 2000 में, सुगिहारा की जन्म शताब्दी पर जापान सरकार ने अपनी अतीत की भूल स्वीकार की। तत्कालीन जापानी विदेश मंत्री ने सुगिहारा के परिवार से आधिकारिक रूप से माफी मांगी। इसके बाद जापानी विदेश मंत्रालय में एक ब्रांज प्लाक का अनावरण किया गया और सुगिहारा को उनका ऐतिहासिक सम्मान और दर्जा वापस दिया गया।