4000 Year Old Ice Water Beneath the Desert: The Saraswati River Miracle

जरा सोचिए एक ऐसी नदी के बारे में, जिसका सफर बर्फ से ढके हिमालय पर्वत से शुरू होकर तपते हुए अरब सागर तक था। उसकी चौड़ाई 8 किलोमीटर से भी ज्यादा थी। पानी की तेज गरज इतनी भयानक थी कि किनारे पर खड़े इंसानों के कान सुन्न हो जाते थे। यह कोई इमेजिनरी स्टोरी नहीं है; हजारों साल पहले वैदिक भारत में सचमुच ऐसी एक विशाल नदी मौजूद थी, जिसका नाम था सरस्वती। प्राचीन ऋषियों ने प्यार और गहरे सम्मान से उसे नदीतमा यानी सभी नदियों में सबसे श्रेष्ठ कहा था।


ऋग्वेद के पन्नों में बड़े गर्व के साथ उस नदी की सुंदर महिमा गाई गई है।


एकाचेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात्।


यानि उफनती हुई नदियों में अकेली परम पवित्र सरस्वती ही ऊंचे पहाड़ों से बहती हुई दूर अरब सागर में जाकर मिल रही है। 


ऋग्वेद के दौर में यह सरस्वती नदी ही हमारी बहुत पुरानी वैदिक कल्चर, एजुकेशन और सभ्यता का मेन सेंटर थी। लेकिन क्वेश्चन उठता है कि प्राचीन धर्मग्रंथों के अनुसार इस परम पवित्र नदी का जन्म कैसे और क्यों हुआ था?


पौराणिक ओरिजिन और समुद्र के अंदर की आग से दुनिया को बचाने की स्टोरी


स्कंद पुराण और पद्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथ हमें एक अमेजिंग पौराणिक स्टोरी से इंट्रोड्यूस कराते हैं। 


पुराणों के मुताबिक, ब्रह्मा जी दुनिया में ज्ञान, चेतना और पवित्रता लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी दिव्य सोच और कमंडलु के पानी से देवी सरस्वती को नदी के रूप में धरती पर प्रकट किया। धरती पर इस नदी की पहली शुरूआत हिमालय की ऊंची चोटी प्लक्ष प्राश्रवण नाम के पहाड़ी सोर्स पर हुई थी।


लेकिन सरस्वती नदी के धरती पर आने के पीछे एक बहुत बड़े सैक्रिफाइस की स्टोरी छिपी थी। पौराणिक कहानियों के अनुसार, महर्षि और्व के भयंकर गुस्से से समुद्र के अंदर की आग (बड़वानल) पैदा हुई थी। यह आग पल भर में पूरी दुनिया को जलाकर राख करने की क्षमता रखती थी। पूरी दुनिया को इस तबाही से बचाने के लिए देवी सरस्वती ने नदी का रूप धारण किया। वह उस भयानक आग को अपने अंदर समेटकर दूर अरब सागर की तरफ बह निकलीं, ताकि समुद्र के गहरे पानी में वह आग शांत हो सके।


यानी पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, पूरी ह्यूमैनिटी और दुनिया को तबाही से बचाने के लिए ही इस सरस्वती नदी की धरती पर एंट्री हुई थी। 


लेकिन जो नदी दुनिया को बचाने के लिए धरती पर उतरी थी, वक्त के साथ उसका रूप बदल गया। वह विशाल नदी कैसे एक अनोखी मिस्ट्री बन गई? इसे समझने के लिए हमें आज के भारत के मैप की तरफ देखना होगा।


आज का नजारा और घग्गर-हाकरा की मिस्ट्री


आज अगर आप भारत का मॉडर्न मैप खोलकर बैठें, तो आपको गंगा, यमुना, सिंधु या ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां तो साफ दिख जाएंगे। लेकिन वहां सरस्वती नाम की कोई नदी नहीं मिलेगी। जो नदी कभी समुद्र में जाकर गिरती थी, वह अचानक कहां गायब हो गई? आज का सच बड़ा ही शॉकिंग और सैड है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास 'सरसूती' नाम का एक बहुत छोटा सा नाला आज भी बहता दिखता है। बारिश के दिनों को छोड़कर यह साल के बाकी समय सूखा ही रहता है।


इससे भी बड़ा हिस्टोरिकल प्रूफ राजस्थान के रेगिस्तान और पाकिस्तान के बॉर्डर एरिया में छिपा है। वहां एक बहुत बड़ा और बिल्कुल सूखा हुआ नदी का ट्रैक यानि बेसिन फैला है। इसे लोकल लैंग्वेज में घग्गर-हाकरा (Ghaggar-Hakra) नदी का फ्लो कहा जाता है। आज की इस सिंपल सी घग्गर नदी के ट्रैक की चौड़ाई देखकर किसी की भी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। तीन से दस किलोमीटर चौड़ा नदी का रास्ता सिर्फ किसी बरसाती नदी के पानी से नहीं बन सकता!


सूखा हुआ यह विशाल रास्ता आज यह क्वेश्चन उठाता है कि, किस रहस्यमयी नेचुरल डिजास्टर की वजह से थार रेगिस्तान की गर्म रेत में यह नदी हमेशा के लिए गायब हो गई? और इस रिसर्च की पहली किरण पड़ती है हमारे बहुत पुराने महाकाव्य के पन्नों पर।


महाभारत का विनाशन और बलराम का प्रूफ


उस गहरी मिस्ट्री का क्लू महाभारत के पन्नों में छिपा है। अगर थोड़ा ध्यान से देखें, तो एक बात समझ आती है। महाभारत के दौर में सरस्वती नदी ऋग्वेद की तरह गरजने वाली और समुद्र में मिलने वाली नदी नहीं रही थी। तब तक यह नदी अपनी जवानी खोकर कमजोर, टुकड़ों में डिवाइडेड और लगभग सूखी हुई नदी का रूप ले चुकी थी।


महाभारत के शल्य पर्व में इसका एक बहुत ही सुंदर और रियल डिस्क्रिप्शन मिलता है। कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध जब करीब आ रहा था, तब श्रीकृष्ण के बड़े भाई महाबली बलराम ने एक फैसला लिया। उन्होंने किसी भी पक्ष में शामिल न होकर अहिंसा का रास्ता चुना। उन्होंने तय किया कि वह सरस्वती नदी के पुराने किनारे-किनारे यात्रा पर निकलेंगे। लेकिन यात्रा शुरू करने के बाद बलराम का सामना एक शॉक करने वाले नजारे से हुआ। उन्होंने देखा कि नदी अब पहले की तरह लगातार बह नहीं रही थी।


जब हरियाणा और राजस्थान के बॉर्डर एरिया में आज के श्रीगंगानगर के पास बलराम पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नदी अचानक रेगिस्तान की रेत के नीचे गायब हो गई थी। महाभारत में इस स्पेसिफिक लोकेशन का नाम विनाशन  दिया गया है। महाभारत के शल्य पर्व के अध्याय 35, श्लोक 53)m का वह हिस्टोरिकल श्लोक आज भी इसकी साइलेंट प्रूफ देता है:


ततो विनशनं राजन् जगाम बलिनां वरः।

शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती॥


यानि हे राजन्! इसके बाद वीर बलराम विनाशन नाम की जगह पर पहुंचे। जहां बुरे काम करने वाले लोगों के स्पर्श से बचने के लिए सरस्वती नदी जमीन के नीचे गायब हो गई थी।


बलराम को असल में कोई पूरी नदी नहीं दिखी थी; वह दरअसल नदी के सुखी हुई रस्ते पर चल रहे थे। महाभारत से पता चलता है कि नदी जमीन के नीचे छिपे रूप में बहती थी। बीच-बीच में वह छोटे तालाबों या कुंडों के रूप में जमीन पर उभरती थी, जिन्हें चमसोद्भेद कहा गया है। बलराम उन्हीं जगहों पर पूजा और स्नान करते थे। बलराम द्वारा देखे गए इस आखिरी रूप की स्टोरी को कई हिस्टोरियंस ने पहले केवल इमेजिनेशन मान लिया था। लेकिन जब आधुनिक सैटेलाइट और स्पेस साइंस ने धरती पर नजर डाली, तो यह स्टोरी सच साबित हो गई।



स्पेस टेक्नोलॉजी और इसरो का शॉक करने वाला खुलासा



हिस्ट्री और साइंस का खेल 21वीं सेंचुरी में आकर पूरी तरह बदल गया, जब इंसानी सैटेलाइट ने स्पेस से धरती की तरफ देखा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने स्पेस में रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट 1995 में 'IRS-1C' और 1997 में 'IRS-1D' सैटेलाइट लॉन्च किया गया, और डेटा भेजना शुरू किया।


अहमदाबाद में मौजूद इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC) के साइंटिस्ट्स ने इस डेटा पर काम किया। जब उन्होंने डिजिटल इमेजेस और खास रडार डेटा का एनालिसिस किया, तो उन्हें एक हैरान कर देने वाला नजारा दिखा। सैटेलाइट की रडार इमेजेस में एक बड़ा सच सामने आया। राजस्थान के रेगिस्तान और गुजरात के रण ऑफ कच्छ के 50-100 फीट नीचे प्राचीन नदी का एक विशाल ट्रैक सांप की तरह बलखाता हुआ गया है। स्पेस से ली गई उन इमेजेस ने इंटरनेशनल लेवल पर साबित कर दिया कि हजारों साल पहले हिमालय से समुद्र तक सचमुच एक बहुत बड़ी नदी बहती थी।


सिर्फ इसरो की सैटेलाइट इमेजेस ही नहीं, इसमें न्यूक्लियर साइंस के सॉलिड प्रूफ भी जुड़ गए। 1995 से 2000 के बीच भारत की मशहूर भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (CGWB) ने एक बड़ी रिसर्च की। उन्होंने राजस्थान के थार रेगिस्तान के गहरे कुओं से पानी के सैंपल लिए और उनकी कार्बन डेटिंग व आइसोटोप टेस्ट की। भाभा रिसर्च सेंटर की साइंटिफिक रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को चौंका दिया! पता चला कि रेगिस्तान के 100 फीट नीचे जो मीठे पानी का विशाल भंडार जमा है, वह हाल-फिलहाल की बारिश का पानी नहीं है। उस जमीन के नीचे छिपे पानी की उम्र लगभग 4 से 8 हजार साल पुरानी है। टेस्ट में साबित हुआ कि वह दूर हिमालय की पिघली हुई बर्फ का पानी है।


स्पेस और न्यूक्लियर साइंस के इस जॉइंट प्रूफ ने नदी के एग्जिस्टेंस पर मुहर तो लगा दी और एक बड़ा क्वेश्चन उठा दिया, आखिर किस भयानक जियोलॉजिकल डिजास्टर ने हिमालय के इस पानी से उसका कनेक्शन तोड़ दिया था?


जियोलॉजिकल डिजास्टर और नदी का गायब होना


इस क्वेश्चन का जवाब खोजने के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और जाने-माने आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. बी. बी. लाल की डीप रिसर्च सामने आई। उनकी गहरी खोजबीन के मुताबिक, आज से लगभग 3,900 से 4,000 साल पहले लगभग 1900 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिम भारत में एक बहुत ही भयानक भूकंप और जमीन के अंदर उथल-पुथल हुई थी।


इस भयानक भूकंप की वजह से हिमालय के नीचे की चट्टानों की बनावट और जमीन का ढांचा ड्रामेटिक तरीके से बदल गया। अब तक सरस्वती नदी को दो मुख्य नदियां अपनी बर्फ का पानी देकर जिंदा रखे हुए थीं–वे थीं सतलुज और यमुना। भूकंप के तेज झटके से सतलुज नदी ने अपना पुराना रास्ता बदलकर पश्चिम की तरफ मोड़ लिया और सिंधु नदी में जाकर मिल गई। दूसरी तरफ, यमुना नदी पूर्व की तरफ मुड़कर गंगा नदी से जा मिली।


जरा सोचिए, अगर किसी इंसान के शरीर से उसकी खून ले जाने वाली दो मुख्य नसें काटकर अलग कर दी जाएं, तो उसका क्या अंजाम होगा? सरस्वती नदी के साथ भी ठीक यही हुआ। बर्फ के पानी का मेन सोर्स छिन जाने से यह विशाल नदी सिर्फ लोकल रेन पर टिकी एक पतली सी धारा बनकर रह गई। रेगिस्तान की भीषण गर्मी में धीरे-धीरे यह छोटे-छोटे कुंडों में बदलती हुई महाभारत के उस विनाशन में जाकर जमीन के नीचे गुम हो गई। नदी के मेन वाटर-सोर्स के खत्म होने के इसी साइंटिफिक रीजन ने आज धर्मग्रंथों और मॉडर्न रिसर्च को एक हैरान कर देने वाले मोड़ पर ला खड़ा किया है।


हिस्ट्री और साइंस का अनोखा कॉम्बिनेशन


आज के साइंस ने एक बात साबित कर दी है कि राजस्थान-हरियाणा के रेगिस्तान के नीचे कभी एक विशाल हिमालयी नदी बहा करती थी, और घग्गर-हाकरा का सूखा हुआ रास्ता उसका फिजिकल सबूत है। हालांकि, यह ठीक वही नदी है जिसे ऋग्वेद में सरस्वती कहा गया है या नहीं, इस पहचान पर दुनिया भर के कुछ इतिहासकार और भाषाविद आज भी सवाल उठाते हैं, और इसे अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं मानना चाहते। फिर भी भारतीय परंपरा और ज्यादातर रिसर्चर्स के लिए महाभारत का ज्योग्राफिकल डिस्क्रिप्शन कोई इमेजिनरी स्टोरी नहीं, बल्कि एक नदी के धीरे-धीरे सूखने की एक परफेक्ट स्टोरी मानी जाती है।


चार हजार साल पहले वैदिक ऋषियों ने इसे मंत्रों में बयान किया था। तीन हजार साल पहले महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में इसे नदी के गायब होने की हिस्ट्री बताया था। आज 21बी सेंचुरी के सैटेलाइट ने स्पेस से उसी इलाके में एक विशाल प्राचीन नदी-मार्ग के होने के सबूत पूरी दुनिया के सामने ला दिए।


इसलिए, सरस्वती नदी सिर्फ एक इमेजिनेशन नहीं है; रेगिस्तान के नीचे बहता एक विशाल, प्राचीन विलुप्त नदी-पथ वाकई मौजूद है और उसका हिस्टोरिकल व साइंटिफिक महत्व निर्विवाद है। भले ही उसकी वैदिक सरस्वती से पूरी तरह पहचान पर विद्वानों में बहस जारी हो।


आज भले ही वह हमारी आंखों के सामने न दिखती हो, लेकिन रेगिस्तान के नीचे छिपा उसका वह प्राचीन ठंडा पानी आज भी हमारी महान सिविलाइजेशन का जीता-जगता सबूत बनकर बह रहा है।