Veer Kunwar Singh: The Warrior Who Won His Final Battle at 81 in 1857
1858 की उस रात बलिया के पास गंगा के शिवपुर घाट पर ब्रिटिश तोपों से लगातार गोलाबारी हो रही थी। उस रात जो घटना घटी, वह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। ईस्ट इंडिया कंपनी के डिस्पैच और इतिहासकार जी. बी. मैलसन की किताब हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्यूटिनी में इस घटना का सीधा ऐतिहासिक दस्तावेज़ मिलता है।
नदी में बहती एक छोटी नाव पर 80 साल के बुजुर्ग योद्धा कुंवर सिंह खड़े थे। ब्रिगेडियर-जनरल डगलस के तोपखाने से छूटे एक गोले ने उनके बाएं हाथ को गंभीर रूप से ज़ख्मी कर दिया था। उस संकट की घड़ी में उन्होंने जो साहसिक फैसला लिया, वह भारतीय इतिहास की एक अहम घटना बन गया।
विद्रोह की शुरुआत और कुंवर सिंह का नेतृत्व
कुंवर सिंह बिहार के वर्तमान भोजपुर जिले के जगदीशपुर के परमार राजपूत राजवंश के शासक थे। 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू किया कुख्यात स्थायी बंदोबस्त और सख्त सूर्यास्त कानून के कारण कई अन्य जमींदारों की तरह कुंवर सिंह को भी अपनी पैतृक संपत्ति गंवानी पड़ी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी की इस आर्थिक नीति के कारण उनके मन में कंपनी सरकार के प्रति गहरा असंतोष था।
25 जुलाई 1857 को दानापुर छावनी की 3री, 8वीं और 40वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया और वे सीधे जगदीशपुर पहुंचे। के. पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट के दस्तावेजों के अनुसार, 80 वर्ष की आयु में भी कुंवर सिंह ने बिना झिझक क्रांतिकारियों का सैन्य नेतृत्व स्वीकार कर लिया।
आरा से बीबीगंज: संघर्ष के मुख्य चरण
नेतृत्व संभालते ही उन्होंने विद्रोही सेना को संगठित किया और सीधे मैदान में उतर आए। इसके बाद कई महत्वपूर्ण सैन्य झड़पें हुईं।
27 जुलाई 1857 को क्रांतिकारी सेना ने योजनाबद्ध हमला करके शाहाबाद जिले के मुख्य शहर आरा पर नियंत्रण कर लिया। वहां मौजूद अंग्रेज अधिकारी और यूरोपीय निवासी जान बचाने के लिए आरा हाउस नाम की दोमंजिला इमारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। इसके दो दिन बाद, 29-30 जुलाई को दानापुर से कैप्टन डनबार के नेतृत्व में 400 जवानों की ब्रिटिश और सिख टुकड़ी आरा पहुंची। लेकिन शहर के प्रवेश द्वार पर ही कुंवर सिंह की सेना ने उन पर अचानक हमला कर दिया, जिससे पूरी टुकड़ी बिखर गई। ईस्ट इंडिया कंपनी के सरकारी रिकॉर्ड की सूची के अनुसार कैप्टन डनबार सहित 200 से अधिक सैनिक इस हमले में मारे गए।
इसके बाद 2-3 अगस्त को बीबीगंज में लड़ाई हुई। यहां क्रांतिकारियों का सामना बक्सर से आई मेजर विंसेंट आयर की सुसज्जित तोपखाना टुकड़ी से हुआ। मेजर आयर की सैन्य रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश तोपों की भारी गोलीबारी के कारण कुंवर सिंह ने रणनीतिक रूप से पीछे हटने का फैसला लिया। इसके बाद आयर ने आरा की घेराबंदी तोड़कर जगदीशपुर किले पर हमला किया और राजमहल को काफी नुकसान पहुंचाया।
उत्तर भारत का अभियान और छापामार रणनीति
जगदीशपुर का किला क्षतिग्रस्त होने के बावजूद कुंवर सिंह का हौसला कम नहीं हुआ। ब्रिटिश तोपों की ताकत को देखते हुए उन्होंने आमने-सामने की जंग के बजाय गुरिल्ला रणनीति अपनाई। विभिन्न प्रांतीय रिकॉर्ड्स और ब्रिटिश अदालती दस्तावेजों में उनके इस अभियान का विस्तृत उल्लेख है।
अगस्त से नवंबर 1857 के दौरान उन्होंने रीवा और बांदा के स्थानीय शासकों से संपर्क साधकर उन्हें एकजुट किया। इसके बाद वे कानपुर पहुंचे और मराठा सैन्य रणनीतिकार तात्या टोपे तथा नाना साहेब के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य योजना बनाई। दिसंबर 1857 से जनवरी 1858 के दौरान वे अवध के लखनऊ पहुंचे, जहां बेगम हज़रत महल ने उन्हें शाही ख़िलअत यानि शाही सम्मान देकर सम्मानित किया और आजमगढ़ क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपते हुए एक ख़ास फ़रमान जारी किया।
इसके बाद 22-26 मार्च 1858 को आजमगढ़ के अतरौलिया में उन्होंने ब्रिटिश कर्नल मिलमैन और कर्नल डेम्स की सेना का सामना किया। चार्ल्स बॉल की पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्यूटिनी के अनुसार, ब्रिटिश सेना को पराजित कर आजमगढ़ पर कब्जा करने से बनारस और लखनऊ के बीच अंग्रेजों का संपर्क मार्ग कट गया था। हालांकि, जब लॉर्ड मार्क केर अतिरिक्त सैन्य बल लेकर पहुंचा, तब कुंवर सिंह रणनीति के तहत आजमगढ़ छोड़कर गंगा नदी की ओर बढ़ गए।
शिवपुर घाट का अभियान और अभूतपूर्व निर्णय
कुंवर सिंह के गंगा की तरफ बढ़ने पर सर एडवर्ड लुगार्ड और ब्रिगेडियर डगलस ने उन्हें घेरने की योजना बनाई। लेकिन कुंवर सिंह ने एक कूटनीतिक चाल चली। उन्होंने गुप्तचरों के माध्यम से ब्रिटिश शिविर तक यह सूचना भिजवा दी कि उनकी सेना बलिया घाट से हाथियों के ज़रिए गंगा पार करेगी।
कैप्टन डगलस के आधिकारिक सैन्य डिस्पैच के अनुसार, जब ब्रिटिश सेना बलिया घाट पर तैनात थी, तब कुंवर सिंह ने वहां से कुछ दूरी पर स्थित शिवपुर घाट पर नावों की व्यवस्था कर ली। 21 अप्रैल की रात वे अपनी सेना के साथ नदी पार करने लगे। हालांकि, अंतिम नाव पर मौजूद कुंवर सिंह पर डगलस की तोपखाना टुकड़ी ने गोलाबारी कर दी, जिससे उनके बाएं हाथ की कलाई गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई।
ज़ख्म से अत्यधिक खून बहने लगा और शरीर में संक्रमण फैलने की स्थिति बन गई। उस समय आसानी से न तो चिकित्सा सहायता उपलब्ध थी और न ही उनके पास अधिक समय था। ब्रिटिश सैन्य दस्तावेजों में दर्ज विवरण के अनुसार, उन्होंने तुरंत अपने दाहिने हाथ से तलवार निकाली और ज़ख्मी हाथ को कोहनी के पास से काटकर गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। मौखिक इतिहास और अभिलेखों के अनुसार उन्होंने कहा—"हे गंगा मैया! तुम्हारा बेटा तुम्हें यह आखिरी भेंट सौंप रहा है।"
जगदीशपुर वापसी और अंतिम विजय
अत्यधिक खून बहने और गंभीर ज़ख्म के बावजूद 22 अप्रैल 1858 को कुंवर सिंह जगदीशपुर पहुंचे। ज़िला गज़ेटियर और तत्कालीन दस्तावेजों में इस दौरान की घटनाओं का विवरण मिलता है।
23 अप्रैल 1858 को आरा छावनी से कैप्टन ले ग्रैंड के नेतृत्व में 355 ब्रिटिश सैनिकों, नाविकों और सिख सिपाहियों की सैन्य टुकड़ी जगदीशपुर पर कब्जे के उद्देश्य से आगे बढ़ी। गंभीर रूप से घायल कुंवर सिंह ने क्षेत्र के घने जंगलों की स्थिति का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश सेना को तीन तरफ से घेर लिया। इस झड़प में ले ग्रैंड सहित लगभग पौने तीन सौ ब्रिटिश सैनिक मारे गए और ब्रिटिश तोपों पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया।
23 अप्रैल को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर किले से ईस्ट इंडिया कंपनी का यूनियन जैक ध्वज हटाकर अपना स्वतंत्र ध्वज फहराया। हालांकि, इस सफलता के तीन दिन बाद, 26 अप्रैल 1858 को अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण के कारण 81 वर्ष की आयु में अपने महल में उनका निधन हो गया।
सरकारी दस्तावेज़, परंपरा और इतिहास का पुनर्पाठ
ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह के ऐसे सैन्य नेता थे, जिन्होंने अंतिम समय तक ब्रिटिश सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया। बिहार स्टेट आर्काइव्स, नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया की फाइलों और कोर्ट-मार्शल के दौरान कुंवर सिंह की सेनापति निशान सिंह के बयान से स्पष्ट होता है कि उनकी सेना का गठन सभी वर्गों और समुदायों के समावेशी सहयोग पर आधारित था।
इन दस्तावेजों में उनके प्रमुख सहयोगियों के नाम मिलते हैं । जैसे तोपखाना प्रमुख इब्राहिम खान; वरिष्ठ तोपची और कमांडर शेख औलाद अली, गुलाम पैगंबर तथा हसन अली खान; मुख्य सेनापति निशान सिंह; प्रमुख रणनीतिकार हरकिशन सिंह और सह-कमांडर के रूप में उनके छोटे भाई अमर सिंह।
आज भी बिहार की लोक-संस्कृति में "अबब जेठुआ तोहरी सुरतिया, वीर कुंवर सिंह..." जैसे लोकगीतों के माध्यम से उनकी स्मृति जीवित है और प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को कुंवर सिंह विजयोत्सव का आयोजन किया जाता है।
हालांकि, इन ऐतिहासिक साक्ष्यों के बावजूद यह विषय विचारणीय है कि राष्ट्रीय इतिहास में कुंवर सिंह और उनके जैसे अन्य स्थानीय सेनानियों को उनका उचित स्थान मिला है या नहीं।
ऐतिहासिक योगदान को मान्यता देने की रूपरेखा
आज राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे ऐतिहासिक योगदानों को उचित मान्यता देने के लिए स्थानीय और संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता है। केंद्र या राज्य सरकारों के लिए सभी स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों को एक साथ राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित करना व्यावहारिक रूप से कठिन है। इसलिए ग्रामीण और जिला स्तर पर स्थानीय नागरिकों और संस्थानों की पहल पर उनके स्मरण की व्यवस्था की जा सकती है।
इसके अंतर्गत वर्ष भर स्थानीय सड़कों, विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के नामकरण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। जिन सेनानियों के नाम औपचारिक इतिहास में कम दर्ज हैं, उन्हें सामने लाने के लिए सरकारी डेटाबेस, क्षेत्रीय दस्तावेज और ब्रिटिश काल के प्रशासनिक दस्तावेजों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।
इस दिशा में केंद्र और राज्य स्तर पर विशेष अनुसंधान समिति का गठन किया जा सकता है। यह समिति दस्तावेजों और स्थानीय प्रमाणों का अध्ययन कर ऐतिहासिक नामों की सूची तैयार करने तथा उन्हें औपचारिक मान्यता प्रदान करने हेतु नीतिगत सिफारिशें प्रस्तुत कर सकती है।
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