Richer Than Apple and Google: The Story of VOC, the World's First $7.9 Trillion Company

आज जो आपकी रसोई का आम मसाला है, करीब 400 साल पहले 17वीं सदी के दौर के यूरोप में वह असीम ताकत, शाही शान और अपार धन का प्रतीक था। आज जब हम एप्पल, सऊदी अरामको या गूगल जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों के ट्रिलियन डॉलर के साम्राज्य को देखते हैं, तो हैरान रह जाते हैं। लेकिन इतिहास हमें अतीत की एक बिल्कुल अलग कॉर्पोरेट मॉन्स्टर के बारे में बताता है।

डच भाषा में इस कंपनी का नाम VOC (Vereenigde Oostindische Compagnie) था। इसे डच ईस्ट इंडिया कंपनी कहा जाता था, जो आज के नीदरलैंड्स और बेल्जियम से चलती थी। यह मानव इतिहास की पहली ग्लोबल कॉर्पोरेट संस्था थी। इसके झंडे वाला जहाज़ एक समय दुनिया के हर ट्रेड रूट पर राज करता था।

इंटरनेशनल इकोनॉमिक हिस्टोरियंस के आंकड़े और एम्स्टर्डम स्टॉक एक्सचेंज के 1637 के डॉक्युमेंट्स एक हैरान करने वाली बात बताते हैं। डच ट्यूलिप मेनिया के दिनों में इस अकेली कंपनी की मार्केट वैल्यू आज दौर में लगभग 7.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई थी।

उस दौर में एशिया के मसालों में से जायफल और लौंग की कीमत सोने से भी ज़्यादा थी। इसी गोल्डन स्पाइस पर अपना एकछत्र कब्ज़ा जमाने के लिए यह कंपनी दुनिया की पहली कॉर्पोरेट जायंट बन गई। और इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और हैरान कर देने वाली कहानी है।

फाइनेंशियल इंजीनियरिंग: पहला IPO और स्टॉक मार्केट का जन्म

मार्च 1602, एम्स्टर्डम का बिज़नेस सेंटर। शहर के धुंध भरे मौसम में बुर्स (Beurs) मैदान में सैकड़ों व्यापारी और आम नागरिक इकट्ठा हैं। समुद्र पार मसालों के बिज़नेस में भारी प्रॉफिट था। लेकिन इसके साथ जहाज़ों के डूबने का बड़ा रिस्क भी जुड़ा था। इस रिस्क को बांटने और भारी फंड जुटाने के लिए VOC ने मॉडर्न फाइनेंस के एक नए चैप्टर की शुरुआत की–IPO! यानी शेयर बाज़ार में पहली बार किसी कंपनी का पब्लिक होना।

डच नेशनल आर्काइव्स के 1602 के डॉक्युमेंट्स से पता चलता है कि VOC ने एम्स्टर्डम स्टॉक एक्सचेंज बनाया। इसके ज़रिए उन्होंने दुनिया में पहली बार आम जनता को अपनी कंपनी के शेयर बेचे। उन्होंने फ्रैक्शनल ओनरशिप और लिमिटेड लायबिलिटी यानि सीमित जवाबदेही का नियम चालू किया। इससे एम्स्टर्डम का एक आम बेकर या दर्जी भी अपनी छोटी सी सेविंग्स से कंपनी का हिस्सेदार बन सकता था। सबसे बड़ी राहत यह थी कि जहाज़ डूबने पर भी उसकी पर्सनल प्रॉपर्टी ज़ब्त नहीं होती थी।

दूर-दराज़ के इलाकों में जंग लड़ने और बड़ी मिलिट्री नौसेना के रखरखाव के लिए कंपनी बाद में बाज़ार में आज के दौर के बॉन्ड्स और फ्यूचर्स ट्रेडिंग जैसे टूल्स लेकर आई। दूसरी तरफ यूरोप के मिडिल क्लास के इस सीधे-सादे इनवेस्टमेंट से समंदर पार खूनी कब्ज़े का प्लान बन रहा था। इस बात की खबर किसी को नहीं थी।

राज्य के अंदर राज्य: खुली अधिकार वाली कॉर्पोरेशन

1602 का 20 मार्च । डच संसद के दरबार में एक अनोखा लीगल डॉक्युमेंट साइन हुआ, 1602 का चार्टर। इस चार्टर ने एक आम कंपनी को वे सारे अधिकार दे दिए, जो सिर्फ एक आज़ाद देश के पास होते हैं। 21 साल के इस लाइसेंस से VOC को पूरे एशिया में ट्रेड करने का एकछत्र अधिकार मिला। साथ ही, अपनी आर्मी बनाने, किले खड़े करने, जंग का ऐलान करने और अपने सिक्के भी छापने की लीगल मंज़ूरी भी मिल गई।

डच इतिहासकार जैकी पैटरसन की रिसर्च बताती है कि VOC देश के अंदर एक दूसरा देश बन चुका था। वे शाही हुकूमत की परवाह किए बिना अपनी मिलिट्री और भाड़े के समुद्री डाकू चलाते थे। एशिया के स्थानीय राजाओं के दरबार में जब डच व्यापारी कदम रखते थे, तो उनके एक हाथ में ट्रेड एग्रीमेंट होता था और दूसरे हाथ में तोप की बत्ती। बात न मानने पर कुछ ही देर में पूरे तटीय इलाके तबाह कर दिए जाते थे।

आर्टिफिशियल संकट और मार्केट मैन्युपुलेशन

यूरोपीय मार्केट में मसालों के दाम आसमान पर रखने के लिए VOC ने एक बेहद क्रूर तरीका अपनाया। इसे एक्सटर्पेशन यानी पेड़ों को काटने और जलाने की पॉलिसी कहा जाता था। किसी द्वीप के हज़ारों-हज़ार पेड़ों को सिर्फ इसलिए काट दिया जाता था क्योंकि वह जगह सीधे VOC के कंट्रोल में नहीं थी। वे बाज़ार में कालाबाजारी यानि मसालों की सप्लाई जानबूझकर कम रखते थे, ताकि कीमतें हमेशा ऊंची बनी रहें।

उस ज़माने के डच नेवी के पेट्रॉलिंग डॉक्युमेंट्स गवाही देते हैं कि अवैध स्मगलिंग रोकने के लिए VOC के युद्धपोत दिन-रात गश्त लगाते थे। डच लोगों को नज़रअंदाज़ करके किसी दूसरे व्यापारी को एक चुटकी मसाला बेचने पर भी स्थानीय लोगों को सरेआम मौत की सज़ा मिलती थी।

इस मोनोपली की भूख कितनी भयानक थी, इसका सबूत 1667 की ट्रीटी ऑफ ब्रेडा से मिलता है। इंडोनेशिया के छोटे से रून (Run) द्वीप पर जायफल का कब्ज़ा पाने के लिए डच बेहद उतावले थे। इसके बदले उन्होंने अंग्रेजों को उत्तरी अमेरिका का एक अनजाना इलाका खुशी-खुशी दे दिया। उस इलाके को आज दुनिया मैनहटन यानि न्यू यॉर्क शहर के नाम से जानती है।

बांदा द्वीप का नरसंहार: खून की कीमत पर जायफल

बात 1621 की है, इंडोनेशिया के हरे-भरे बांदा द्वीप समूह की। उस समय पूरी दुनिया में केवल इन्हीं छोटे-छोटे द्वीपों पर कीमती जायफल उगता था।

VOC के गवर्नर जनरल यान पीटरसून कोएन ने एक खौफनाक हुक्म जारी किया–मकसद पूरा करने के लिए कोई भी रास्ता अपनाया जा सकता है। बांदा के निवासियों ने डच लोगों को सस्ते में मसाले बेचने से मना कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों के साथ ट्रेड जारी रखा। इसी बात की भयानक सज़ा उन्हें भुगतनी पड़ी।

येल यूनिवर्सिटी के जैनोसाइड स्टडीज़ प्रोग्राम और VOC की सीक्रेट डायरी से चौंकाने वाले आंकड़े मिलते हैं। मई 1621 तक बांदा द्वीप की 15,000 आबादी में से सिर्फ कुछ सौ लोग ही ज़िंदा बचे। बाकी सभी का कत्लेआम कर दिया गया या उन्हें ज़ंजीरों में जकड़कर ग़ुलामों के बाज़ार में बेच दिया गया।

इस कत्लेआम के लिए डच व्यापारियों ने जापान से रोनिन सामूराई हत्यारों को बुलाया था। इन हत्यारों ने बांदा के कबीले के सरदारों को लाइन में खड़ा करके सरेआम उनके सिर काट दिए। अपनों के खून से लाल हुई उस ज़मीन पर फिर पार्कनियर्स यानि डच मैनेजर्स को बिठाया गया। ये मैनेजर्स ग़ुलामों पर कोड़े बरसाकर VOC के लिए जायफल वसूलते थे।

अंदरूनी सड़न – भ्रष्टाचार और टू बिग टू फेल का पतन

इतिहास हमें पाठ पढ़ाता है के ज़ुल्म और ज़ोर-जबरदस्ती के दम पर खड़ा साम्राज्य बहुत लंबे समय तक नहीं टिकता। 18वीं सदी के आते-आते VOC अंदर से सड़ने लगी। डच समाज में उस समय एक मज़ाक मशहूर हो गया था । VOC का मतलब है Vergaan Onder Corruptie, यानी भ्रष्टाचार में डूबी कंपनी। आम नाविक से लेकर गवर्नर तक, हर कोई कंपनी के जहाज़ों से अपनी पर्सनल स्मगलिंग करने लगा। नतीजा यह हुआ कि कंपनी का असली रेवेन्यू ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

इनवेस्टर्स को धोखे में रखने और शेयर के दाम बढ़ाकर रखने के लिए VOC अपनी कमाई से ज़्यादा डिविडेंड बांटने लगी। यह आज के दौर की पोंज़ी स्कीम जैसा ही एक रूप था।

1795 में फ्रांस की क्रांति और नीदरलैंड्स में मची उथल-पुथल के बाद कंपनी का असली सच सामने आ गया। 31 दिसंबर 1799 को यह कंपनी पूरी तरह डूब गई। उस पर लगभग 137 मिलियन गिल्डर यानि आज के लगभग 8 बिलियन अमरीकी डॉलर का भारी कर्ज़ था। आखिरकार इतिहास का यह सबसे बड़ा कॉर्पोरेट जायंट आधिकारिक तौर पर दिवालिया घोषित हो गया।

मॉडर्न वर्ल्ड ऑर्डर पर VOC का स्थायी प्रभाव

डच ईस्ट इंडिया कंपनी के पतन को दो सदियां बीत चुकी हैं। लेकिन उसका असर आज भी हमारी इस आधुनिक दुनिया में नज़र आता है। VOC भले ही इतिहास से मिट चुकी है, लेकिन उसका बनाया सिस्टम आज के कॉर्पोरेट कैपिटालिज़्म का बेस है।

आज कानून की नज़र में किसी कंपनी को एक इंसान की तरह कॉर्पोरेट पर्सनहुड का दर्जा मिलता है। इस कांसेप्ट की शुरुआत इसी डच कंपनी ने की थी। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की रिसर्च बताती है कि आज की ग्लोबल सप्लाई चेन, मल्टीनेशनल शेयारहोल्डिंग और अपने फायदे के लिए मिलिट्री का इस्तेमाल करने का मॉडर्न ब्लूप्रिंट VOC के दफ्तरों में ही तैयार हुआ था।

सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने पूरब की दौलत लूटकर पश्चिम को अमीर बनाया। उनके बनाए इस आर्थिक भेदभाव का असर ग्लोबल साउथ आज भी झेल रहा है। इसीलिए डच ईस्ट इंडिया कंपनी सिर्फ अतीत का कोई किस्सा नहीं है। यह आज के मॉडर्न फ्री-मार्केट कैपिटालिज़्म की नींव रखने वाला पहला और सबसे खतरनाक कॉर्पोरेट चेहरा था।