The Indian Ocean Before 1498: The World’s Greatest Free Trade Network Explained
1453 का साल इतिहास का एक अहम मोड़ साबित हुआ। ऑटोमन इम्पायर के सुल्तान मेहमद सेकंड ने कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्जा कर लिया, जिससे यूरोप के लिए पुराने सिल्क रूट्स और सभी जमीनी रास्ते बंद हो गए। मसालों और कीमती सामानों के नए समुद्री रास्तों की तलाश में स्पेन और पुर्तगाल के नाविक अनजान महासागरों में उतरे, और मई 1498 में वास्को द गामा ने भारत के कालीकट तट पर पहला कदम रखा। ठीक यहीं से दुनिया के समुद्री इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल गई।
अगली साढ़े चार सदियों तक इंडियन ओशन पर यूरोपीय शक्तियों का एकतरफा दबदबा रहा। तोपों की आवाज, डच ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की कूटनीति ने इस विशाल अंतरराष्ट्रीय महासागर को यूरोप का एक निजी तालाब बनाकर रख दिया। लेकिन आज हम उनकी बात नहीं करेंगे । हम बात करेंगे 1498 के इस मोड़ से पहले इंडियन ओशन का स्वरूप कैसा था? इस प्राचीन समुद्री सभ्यता की कमान किसके हाथों में थी? और यूरोपीय एंट्री के बाद सदियों पुरानी वे आज़ाद व्यापारिक व्यवस्थाएं कहां गुम हो गईं?
क्षेत्रीय संप्रभुता और ‘मारे लिबरम’ का दर्शन
यूरोपीय शक्तियों के एंट्री से पहले इंडियन ओशन किसी एक राजा की संपत्ति नहीं था, बल्कि यह अलग-अलग राजवंशों के शक्ति संतुलन से संचालित होता था। डच लीगल एक्सपर्ट ह्यूगो ग्रोशियस ने 1609 के एक मशहूर दस्तावेज में इसे मारे लिबरम यानी खुले समुद्र की नीति का नाम दिया। यहां किसी एक साम्राज्य का एकाधिकार नहीं था। स्थानीय शासकों का प्रशासनिक नियंत्रण जरूर था, लेकिन समुद्री रास्ते सभी के लिए पूरी तरह खुले हुए थे।
तेरहवीं सदी के चीनी यात्री झाओ रुगुआ ने 1225 ईस्वी की अपनी किताब झू फान झी में लिखा कि दक्षिण-पूर्व एशिया का श्रीविजय साम्राज्य मलक्का और सुंडा के समुद्री मार्गों का प्रबंधन बहुत सलीके से संभालता था। बाद में इस इलाके की कमान मलय राजवंश की मलक्का सल्तनत के पास आई, जिसका जिक्र ऐतिहासिक दस्तावेज सेजराह मेलायु में मिलता है। सुल्तान मंसूर शाह के दौर में मलक्का विश्व व्यापार का मुख्य केंद्र बन गया था, जहां बिना किसी सैन्य डर के खुलकर व्यापार होता था।
पूर्वी अफ्रीका में किलवा सल्तनत सोफाला के सोने और हाथी दांत का समुद्री व्यापार चलाती थी, जिसका विवरण फारसी इतिहासकार शिहाब अल-दीन अल-उमरी की किताब मसालिक अल-अमसार और किताब अल-सुल्वा में मिलता है। वहीं भारत के पश्चिमी तट पर कालीकट का ज़ामोरिन राजवंश और गुजरात की मुज़फ़्फ़रीद सल्तनत बिना किसी नाकेबंदी के खुले व्यापार को बढ़ावा दे रहे थे। यह पूरा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तोपों पर नहीं, बल्कि मानसूनी हवाओं के प्राकृतिक चक्रों पर टिका हुआ था।
पुरातात्विक प्रमाण, प्राचीन ग्रंथ और व्यापारिक संगठन
इन समृद्ध समुद्री साम्राज्यों के पुख्ता लिखित और पुरातात्विक प्रमाण उस दौर के कई ग्रंथों और शिलालेखों में मौजूद हैं। दसवीं सदी के अरब इतिहासकार अल-मसऊदी ने 956 ईस्वी की अपनी किताब मुरुज अध-धहब में दर्ज किया कि भारत के पश्चिमी तट पर राष्ट्रकूट राजवंशों के शासन में अरब और स्थानीय व्यापारी बिना किसी रोक-टोक के गतिविधियां संचालित करते थे।
दक्षिण भारत में चोल राजवंश का एक मजबूत नेवल सिस्टम था। तंजावुर के मंदिर शिलालेखों और 1006 ईस्वी के लार्जर लेडेन ताम्रपत्र बताते हैं कि राजराजा चोल और राजेंद्र चोल ने 1025 ईस्वी में श्रीविजय साम्राज्य पर अपना बेड़ा भेजा था, फिर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कोई सैन्य कर नहीं लगाया। सुमात्रा में मिला 1088 ईस्वी का लोबू तुआ शिलालेख यह साबित करता है कि मनिग्रामम और अय्यावोले 500 जैसे तमिल व्यापारिक संगठनों के नेटवर्क इंडोनेशिया तक फैले हुए थे।
नेविगेशन की जानकारी और नौवहन तकनीक में उस दौर के एशियाई नाविक काफी आगे थे। ओमान के नाविक अहमद इब्न माजिद ने 1490 ईस्वी की अपनी किताब किताब अल-फ़वायद में मानसूनी हवाओं, समुद्री धाराओं और ध्रुव तारे से अक्षांश नापने के गणितीय नियम दर्ज किए, जिसके लिए वे कमाल नामक यंत्र का उपयोग करते थे। 830 ईस्वी का बेलितुंग शिपव्रेक और इब्न बतूता का 1354 ईस्वी का रिहला यह दिखाते हैं कि एशियाई जहाजों में लोहे की कीलों के बजाय नारियल के रेशों से सिलाई की जाती थी, जिन्हें सौन बोट्स कहा जाता था। ये उथले पानी में काफी सुरक्षित थीं। वहीं कैरो जेनिज़ा दस्तावेजों के मुताबिक गुजराती बानिया, तमिल चेत्तियार और केरल के मप्पिला व्यापारी केवल हुंडी के दम पर करोड़ों का लेन-देन संभालते थे।
चीनी मिंग राजवंश का आगमन और 1433 ईस्वी का खालीपन
यूरोपीय लोगों के आने से छह दशक पहले इंडियन ओशन में एक बड़ी भू-राजनीतिक हलचल हुई। 1405 से 1433 ईस्वी के बीच चीन के मिंग सम्राट योंगले ने मुस्लिम एडमिरल झेंग हे की कमान में सात विशाल अभियान भेजे।
श्रीलंका का 1409 ईस्वी का गॉल त्रिभाषी शिलालेख तीन भाषाओं यानि चीनी, तमिल, फारसी में इस यात्रा की गवाही देता है। मिंग राजवंश के आधिकारिक रिकॉर्ड्स इंगया शेंगलान और सिंगचा शेंगलान बताते हैं कि 300 से ज्यादा विशाल खजाना जहाजों के साथ झेंग हे लाल सागर और अफ्रीका तक पहुंचे थे। चीनियों की यह मौजूदगी किसी देश पर कब्जा करने के लिए नहीं, बल्कि व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए थी। लेकिन 1435 में सम्राट शुआंदे की मौत के बाद 1436 ईस्वी में मिंग कोर्ट ने हाइजिन नामक कड़ा प्रतिबंध लागू कर दिया।
चीन ने नया जहाज बनाना बंद कर दिया और अपने सभी महासागरीय जहाजों को धीरे धीरे नष्ट करके, खुद को अंतरराष्ट्रीय राजनीति से अलग कर लिया। चीनियों के अचानक हटने से इंडियन ओशन के प्रमुख समुद्री रास्तों पर एक बड़ा रणनीतिक खालीपन पैदा हो गया ।
1433 से 1498 की ट्रांजिशन टाइमलाइन: मिंग साम्राज्य के बाद की समय
1433 ईस्वी में मिंग इम्पायर के हटने से समुद्र में भले ही एक स्ट्रैटेजिक वैक्यूम बना, लेकिन 1430 से 1460 के दशक का यह शुरुआती दौर एशियन ट्रेडर्स के लिए एक गोल्डन टाइम साबित हुआ। 1445-1450 के बीच मलक्का सल्तनत सबसे बड़ा फ्री-ट्रेड हब बनी, जहां मसालों और रेशम का व्यापार बिना किसी पाबंदी के होने लगा। इसी बीच 1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल के पतन ने यूरोप के लिए पुराने रास्ते बंद कर दिए, जबकि 1458-1465 के दौरान गुजरात के खंभात बंदरगाह से कपड़ा व्यापार का रिकॉर्ड विस्तार हुआ।
1470 से 1485 के दशक में यह समुद्री नेटवर्क प्रशासनिक और आर्थिक रूप से और मजबूत हुआ। 1470-1475 के बीच मलक्का में उंद्दांग-उंद्दांग लाउत मेलका जैसे ऐतिहासिक कानून लागू किए गए, जिसने बिना किसी युद्धपोत के ट्रेडर्स को फुल सिक्योरिटी दी। वहीं 1480-1485 के दौरान पूर्वी अफ्रीका की किलवा सल्तनत ने सोफाला के सोने और हाथी दांत के व्यापार से पूरे इंडियन ओशन की अर्थव्यवस्था को लगातार मजबूती दी।
1480 के दशक के अंत में यूरोपीय गतिविधियों और वैज्ञानिक विकास ने इस 65 सालों के दौर को अंतिम चरण में पहुंचा दिया। 1487 में पुर्तगाली सीक्रेट एजेंट पेरू दा कोविल्हा ने भारत आकर गुप्त मैप्स यूरोप भेजे, 1488 में डियास ने केप ऑफ गुड होप पार किया, और 1490 में नाविक अहमद इब्न माजिद ने मानसूनी हवाओं पर साइंटिफिक गाइड लिखी। यह टाइमलाइन साबित करती है कि 1498 में पुर्तगाली तोपों की एंट्री से पहले तक इंडियन ओशन की पूरी व्यवस्था सुरक्षित और आत्मनिर्भर थी।
पुर्तगाली घुसपैठ और कार्ताज़ सिस्टम की हिंसा
धीरे धीरे पुर्तगालियों ने एशिया के समुद्री रास्तों पर हिंसक हमले शुरू कर दिए। 20 मई 1498 को वास्को द गामा ने कालीकट के कप्पड़ तट पर लंगर डाला। पुर्तगाली लेखक गैसपर कोरिया की किताब लेंदस दा इंडिया के अनुसार, यूरोपीय व्यापारी एशियाई बाजारों में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्होंने हथियारों का सहारा लिया।
गवर्नर अल्बुकर्क ने रणनीतिक प्रवेश द्वारों पर कब्जा करने की योजना बनाई। 1507 में होर्मुज, 1510 में गोवा और 1511 में मलक्का पर तोपों के बल पर कब्जा कर लिया गया। इतिहासकार फर्नाओ लोपेज दे कास्तानहेडा के अनुसार, 1502 ईस्वी से पुर्तगालियों ने कार्ताज़ सिस्टम लागू किया। बिना कार्टाज़ वाले जहाजों को पुर्तगाली नौसेना समुद्र में डुबो देती थी, माल लूट लेती थी और चालक दल को गुलाम बना लेती थी। इस तरह खुले समुद्र की परंपरा को खत्म कर संगठित हिंसा की शुरुआत की गई।
क्षेत्रीय राजवंशों का प्रतिरोध और दीव का युद्ध
पुर्तगाली हिंसा के खिलाफ स्थानीय शासकों ने कड़ा प्रतिरोध दिखाया। कालीकट के ज़ामोरिन के नौसैनिक प्रमुख कुंजली मरक्कर परिवार ने इतिहास में पहली बार संगठित छापामार युद्ध शुरू किया। उन्होंने पारवोस नामक छोटी, तेज़ नावों के जरिए संकरी खाड़ियों से पुर्तगाली जहाजों पर अचानक हमले किए। केरल के विद्वान ज़ैनुद्दीन मख़दूम सेकंड की 1583 ईस्वी की किताब तुहफत अल-मुजाहिदीन में इस संघर्षपूर्ण इतिहास और पुर्तगाली अत्याचारों का पूरा ब्योरा मिलता है।
3 फरवरी 1509 को दीव के नौसैनिक युद्ध में एक बड़ा संयुक्त गठबंधन बना, जिसमें गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, मिस्र की ममलुक सल्तनत, ऑटोमन इम्पायर और कालीकट की नौसेना शामिल थी। इस संयुक्त बेड़े ने पुर्तगाली गवर्नर फ्रांसिस्को डी अल्मेडा के खिलाफ मोर्चा खोला। हालांकि, पुर्तगालियों की उन्नत तोप-आधारित रणनीति के आगे एशियाई गठबंधन की हार हुई। इस हार ने इंडियन ओशन की पुरानी व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी।
पुराने व्यापारिक नेटवर्क्स का पतन और रूपांतरण
दीव की हार और मलक्का के पतन के बाद एशियाई राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घटने लगा। फिर भी, 1650 ईस्वी में ओमान के यारूबी राजवंश के इमाम सुल्तान बिन सैफ ने मस्कट से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया, जिसका जिक्र अल-फतह अल-मुबीन में मिलता है। ओमानियों ने 1698 में फोर्ट जीसस जीतकर पूर्वी अफ्रीका में अपनी सत्ता स्थापित की।
दूसरी ओर, गुजराती बानिया, तमिल और मप्पिला व्यापारी बड़े अंतरराष्ट्रीय मार्गों से हटकर तटीय व्यापार या तस्करी तक सीमित हो गए। गुजराती बही-खातों और डच रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि कई जहाज मालिक अपने जहाज गंवाने के बाद यूरोपीय कंपनियों के महाजन या दुभाषिए बन गए। तोपों पर आधारित यूरोपीय कानूनों और मुद्रा प्रणाली ने आखिरकार सदियों पुरानी उस समृद्ध और आज़ाद समुद्री व्यवस्था को इतिहास के पन्नों में समेट दिया।
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